Thursday, 28 January 2016

Computer Knowledge Notes in Hindi for IBPS Bank and Competitive Exams

कम्प्यूटर का विकास (Development of Computer)


1450 B.C. : अबेकस (The Abacus): यह एक प्राचीन गणना यंत्र है जिसका आविष्कार प्राचीन बेबीलोन में अंकों की गणना के लिए किया गया था। इसे संसार का प्रथम गणक यंत्र कहा जाता है। इसमें तारों (Wires) में गोलाकार मनके पिरोयी (beads) जाती है जिसकी सहायता से गणना को आसान बनाया गया।
1600 A.D. : नैपीयर बोन्स (Napier Bones): यह दूसरा गणना यंत्र है जिसका आविष्कार एक स्काॅटिष गणितज्ञ फ्जाॅन नेपीयरय् ने किया।
1642 A.D. : ब्लेस पास्कलः फ्रांस के गणितज्ञ ब्लेज पास्कल (Blaise Pascal) ने 1642 में प्रथम यांत्रिक गणना मशीन का आविष्कार किया। यह केवल जोड़ व घटा सकती थी। अतः इसे एडिंग मशीन (Adding Machine) भी कहा गया। इसको पास्कलाइन भी कहा गया है। जब पास्कल ने यह मशीन बनाई तब वह केवल 19 वर्ष के थे।
1962 A.D. : मल्टिप्लाइंग मशीनः गोटरीड लेबनीज (जर्मनी) ने पास्कल के मशीन को और बेहतर बनाया जिससे गुणा- भाग भी किया जा सकता था। गोटरीड ने सर आइजक न्यूटन के साथ काम करके गणित के कैलकुलस (Calculus) का विकास भी किया था। इनके द्वारा विकसित कैलकुलेटर (Calculator ) की मदद से आसानी से जोड, गुणा भाग और घटाव किया जा सकता है।
1813 A.D. : डिफरेंज इंजन (Difference Engine) चार्ल्स बैबेज- इंग्लैंडः उन्नीसवी सदी के शुरु से ही चार्ल्स बैवेज एक मशीन बनाने का काम कर रहे थे जो जटिल गणनाएं कर सकता था। 1813 में उन्होंने डिफरेंस इंजन का विकास किया जो भाप से चलता था। इसके द्वारा गणनाओं का प्रिंट भी किया जा सकता था।
1800 A.D. : जैकुआर्ड लुम-जोसेफ मारी जैकुआर्डः उन्नीसवी सदी के शुरु में फ्रांस में जोसेफ मारी जैकुआर्ड ने एक प्रोग्राम किया जाने वाला लुम बनाई जो बड़े-बड़े कार्ड जिनमें छेद पंच किया गया था जिससे आसानी से पैटर्न बनाई जा सकती थी। यह 20 से 25 वर्ष पहले तक इस्तेमाल किया जा रहा था।

कम्प्यूटर के विकास का वर्गीकरण

पहली पीढ़ी के कम्प्यूटर (First Generation Computers) (1946 – 1959)

  • इसमें निर्वात ट्यूब (Vacuum Tubes) का प्रयोग किया गया।
  • इनमें मशीनीय भाषा (Mechine Language) का प्रयोग किया गया। भंडारण के लिए पंचकार्ड का प्रयोग किया गया।
  • ये आकार में बड़े (Bulky) और अधिक ऊर्जा खपत करने वाले थे।
  • एनिएक (ENIAC), यूनीबैक (UNIVAC) तथा आईबीएम (IBM) के ekdZ–I इसके उदाहरण हैं।
  • 1952 में डाॅ. ग्रेस हापर द्वारा असेम्बली भाषा (Assembly Language) के आविष्कार से प्रोग्राम लिखना कुछ आसान हो गया।

दूसरी पीढ़ी के कम्प्यूटर (Second Generation Computers) (1959 – 1965)

  • निर्वात ट्यूब की जगह ट्रांजिस्टर का प्रयोग किया जो हल्के, छोटे और कम विद्युत खपत करने वाले थे। इनकी गति तीव्र और त्रुटियां कम थी
  • पंचकार्ड की जगह चुम्बकीय भंडारण उपकरणों (Magnetic Storage Devices) का प्रोयोग किया गया जिससे भंडारण क्षमता और गति में वृद्धि हुई।
  • व्यवसाय तथा उद्योग में कम्प्यूटर का प्रयोग आरंभ हुआ। बैच आपरेटिंग सिस्टम (Batch Operating System) का आरंभ किया गया।
  • सॉफ्टवेयर में कोबोल (COBOL – Common Business Oriented Language) और फोरट्रान (FORTRAN) जैसे उच्च स्तरीय भाषा का विकास आईबीएम द्वारा किया गया। इससे प्रोग्राम लिखना आसान हुआ।

तीसरी पीढ़ी के कम्प्यूटर (Third Generation Computers) (1965 – 1975)

  • ट्रांजिस्टर की जगह इंटीग्रेटेड सार्किट (IC- Intergrated Cirecuit) का प्रयोग शुरु हुआ जिसमें सैकड़ों इलेक्ट्राॅनिक उपकरण जैसे ट्राजिस्टर, प्रतिरोधक (Resistor) और संधारित्र (Capactitor) एक छोटे चिप पर बने होते हैं।
  • प्रारंभ में SSI (Small Scale Integration) और बाद में MSI (Medium Scale Integration) का प्रयोग किया गया।
  • इस पीढ़ी के कम्प्यूटर हल्के, कम खर्चीले तथा तीव्र थे और अधिक विश्वसनीय थे।
  • चुम्बकीय टेप और डिस्क के भंडारण क्षमता में वृद्धि हुई। रैम (RAM Random Access Memory) के कारण गति में वृद्धि हुई।
  • उच्च स्तरीय भाषा में पीएल -I (PL/I), पास्कल (PASCAL) तथा बेसिक (BASIC) का विकास हुआ।
  • टाइम शेयरिंग आॅपरेटिंग सिस्टम (Time Sharing Operating System) का विकास हुआ।
  • हाॅर्डवेयर और सॉफ्टवेयर की अलग-अलग बिक्री प्रारंभ हुई। इससे उपयोगकर्ता आवश्यकतानुसार सॉफ्टवेयर ले सकता था।
  • 1965 में डीइसी (DEC- Digital Equipment Corporation) द्वारा प्रथम व्यवसायिक मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer) पीडीपी-8 (Programmed Data Processor-8) का विकास किया गया।

चौथी पीढ़ी के कम्प्यूटर (Fourth Generation Computers (1975 – 1989)

  • एलएसआई (LSI-Large Scale Intergration) तथा वीएलएसआई (VLSI-Very Large Scale Integration) चिप तथा माइक्रो प्रोसेसर के विकास से कम्प्यूटर के आकार में कमी तथा क्षमता में वृद्धि हुई।
  • माइक्रो प्रोसेसर का विकास एम ई हौफ ने 1971 में किया। इससे व्यक्तिगत कम्प्यूटर (Personal Computer)का विकास हुआ।
  • चुम्बकीय डिस्क और टेप का स्थान अर्धचालक (Semiconductor) मेमोरी ने ले लिया। रैम (RAM) की क्षमता में वृद्धि से कार्य अत्यंत तीव्र हो गया।
  • उच्च गति वाले कम्प्यूटर नेटवर्क (Network) जैसे लैन (LAN) व वैन (WAN) का विकास हुआ।
  • समानान्तर कम्प्यूटिंग (Parallel Computing): तथा मल्टीमीडिया का प्रचलन प्रारंभ हुआ।
  • 1981 में आईबीएम (IBM) ने माइक्रो कम्प्यूटर का विकास किया जिसे पीसी (PC- Personal Computers)कहा गया।
  • सॉफ्टवेयर में ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (GUI- Graphical User Interface) के विकास ने कम्प्यूटर के उपयोग को सरल बना दिया।
  • आपरेटिंग सिस्टम में एम.एस. डाॅस (MS-DOS), माइक्रोसॉफ्ट विण्डोज (MS- Windows) तथा एप्पल आॅपरेटिंग सिस्टम (Apple OS) का विकास हुआ
  • उच्च स्तरीय भाषा में “C” भाषा का विकास हुआ जिसमें प्रोग्रामिंग सरल थी।
  • ∙उच्च स्तरीय भाषा का मानकीकरण किया गया ताकि किसी प्रोग्राम को सभी कम्प्यूटर में चलाया जा सके।

पाचवीं पीढ़ी के कम्प्यूटर (Fifth Generation Computers) (1989 – अब तक)

  • यूएलएसआई (ULSI-Ultra Large Scale Intergration) के विकास से करोड़ों इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों को चिप पर लगाया जा सकता। आप्टिकल डिस्क (Optical disk) जैसी सीडी के विकास ने भंडारण क्षेत्र में क्रांति ला दी
  • नेटवर्किंग के क्षेत्र में इंटरनेट (Internet), ई-मेल (e-mail) तथा डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू (www- world wide web) का विकास हुआ।
  • नये कम्प्यूटर में कृत्रिम ज्ञान क्षमता (Artificial Intelligence) डालने के प्रयास चल रहे हैं ताकि कम्प्यूटर परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं निर्णय ले सके।
  • मैग्नेटिक बबल मेमोरी (Magnetic Bubble Memory) के प्रयोग से भंडारण क्षमता में वृद्धि हुई।
  • पोर्टेबल पीसी (Portable PC) और डेस्क टाॅप (Desktop PC) ने कम्प्यूटर को जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र से जोड़ दिया।

कम्प्यूटर का वर्गीकरण (Classification of Computer)

कार्य पद्धति के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Working Technology)


तकनीक के आधार पर कम्प्यूटर को तीन प्रकार से बांटा जाता है

1. एनालाॅग (Analog Computer)

इसमें विद्युत के एनालाॅग रूप (भौतिक राशि जो लगातार बदलती रहती हैंद्ध का प्रयोग किया जाता है। इनकी गति अत्यंत धीमी होती है। अब इस प्रकार के कम्प्यूटर प्रचलन से बाहर हो गए हैं। एक साधारण घड़ी, वाहन का गति मीटर (Speedo-meter), वोल्टमीटर आदि एनालाॅग कम्प्यूटिंग के उदाहरण हैं।

2. डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer)

ये इलेक्ट्राॅनिक संकेतों पर चलते हैं तथा गणना के लिए द्विआधारी अंक पद्धति Binary System 0 या 1 का प्रयोग किया जाता है। इनकी गति तीव्र होती है। वर्तमान में प्रचलित अधिकांश कम्प्यूटर इसी प्रकार के हैं।

3. हाइब्रिड कम्प्यूटर (Hybrid Computer)

यह डिजिटल व एनालाॅग कम्प्यूटर का मिश्रित रूप है। इसमें गण्ना तथा प्रोसेसिंग के लिए डिजिटल रूप का प्रयोग किया जाता है। जबकि इनपुट तथा आउटपुट में एनालाॅग संकेतों का उपयोग होता है। इस तरह के कम्प्यूटर का प्रयोग अस्पताल, रक्षा क्षेत्र व विज्ञान आदि में किया जाता है।

आकार के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Shape)

1. मेन फ्रेम कम्प्यूटर (Mainframe Computer)

ये आकार में काफी बड़े होते हैं तथा इसमें माइक्रो प्रोसेसर की संख्या भी अधिक होती है। इसके कार्य करने और ग्रहण की क्षमता अत्यंत अधिक तथा गति अत्यंत तीव्र होती है। ये सामान्यतः 32 या 64 बिट माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग करते हैं। इस पर एक साथ कई लोग अलग-अलग कार्य कर सकते हैं। इसमें आन-लाइन (on line) रहकर बड़ी मात्रा में डाटा प्रोसेसिंग किया जा सकता है।
उपयोगः बड़ी कम्पनियाँ बैंक, रक्षा, अनुसंधान, अंतरिक्ष आदि के क्षेत्र में।

2. मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer)

वे आकार में मेन फ्रेम कम्प्यूटर से छोटे जबकि माइक्रो कम्प्यूटर से बड़े होते हैं। इसका अविष्कार 1985 में डीइसी (DEC Digital Equipment Corporation) नामक कम्पनी ने किया। इसमें से अधिक माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग किया जाता है। इसकी संग्रहण क्षमता और गति अधिक होती है। इस पर कई व्यक्ति एक साथ काम कर सकते हैं, अतः संसाधनों का साझा उपयोग होता है।
उपयोगः यात्री आरक्षण, बड़े आॅफिस, कम्पनी, अनुसंधान आदि में।

3. माइक्रो कम्प्यूटर (Micro Computer)

इसका विकास 1970 में प्रारंभ हुआ जब सीपीयू में माइक्रो प्रोसेसर का उपयोग किया जाने लगा। इसका विकास सर्वप्रथम आईबीएम कम्पनी ने किया। इसमें 8, 16, 32 या 64 बिट माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग किया जाता है।
वीएलएसआई (VLSI-Very Large Scale Integration) और यूएलएसआई (ULSI-Ultra Large Scale Integration) से माइक्रो प्रोेसेसर के आकार में कमी आई है जबकि क्षमता कई गुना बढ़ गयी है। मल्टीमीडिया और इंटरनेट के विकास ने माइक्रो कम्प्यूटर को उपयोगिता के हर क्षेत्र में पहुंचा दिया है।
उपयोगः घर, आफिस, विद्यालय, व्यापार, उत्पादन, रक्षा, मनोरंजन, चिकित्सा आदि अनगिनत क्षेत्रों में इसका उपयोग हो रहा है।

4. पर्सनल कम्प्यूटर (Personal Computer-PC)

आजकल प्रयुक्त होने वाले पीसी (PC-Personal Computer) वास्तव में माइक्रो कम्प्यूटर ही हैं। यह छोटे आकार का सामान्य कार्यों के लिए बनाया गया कम्प्यूटर है। इस पर एक बार में एक ही व्यक्ति (Single User) कार्य कर सकता है।
इसका आपरेटिंग सिस्टम एक साथ कई कार्य करने की क्षमता वाला (Multitasking) होता है। पीसी को टेलीफोन और माॅडेम (Modem) की सहायता से इंटरनेट से जोड़ा जा सकता है। कुछ प्रमुख पीसी निर्माता कम्पनी हैं- आईबीएम (IBM), लेनोवो (Lenovo), एप्पल (Apple), काम्पैक (Compaq), जेनिथ, एचसीएल, एचपी, इत्यादि
उपयोगः पीसी का विस्तृत उपयोग घर, आॅफिस, व्यापार, शिक्षा, मनोरंजन, डाटा संग्रहण, प्रकाशन आदि अनेक क्षेत्रों में किया जा रहा है।
पीसी का विकास 1981 में हुआ जिसमें माइक्रो प्रोसेसर 8088 का प्रयोग किया गया। इसमें हाॅर्ड डिस्क ड्राइव लगाकर उसकी क्षमता बढ़ायी गयी तथा इसे पीसी- एक्सटी (PC- XT- Personal Computer- Extended Technology) नाम दिया गया। 1984 में नये माइक्रो प्रोसेसर- 80286 से बने पीसी को पीसी- एटी (PC-AT- Personal Computer Advanced Technology) नाम दिया गया। वर्तमान पीढ़ी के सभी पर्सनल कम्प्यूटर को पीसी एटी ही कहा जाता है।

5. नोटबुक कम्प्यूटर या लैपटाॅप (Notebook Computer or Laptop)

यह नोटबुक के आकार का ऐसा कम्प्यूटर है जिसे ब्रीफकेस में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। इसमें पीसी की सभी विशेषताएं मौजूद रहती हैं। चूंकि इसका उपयोग गोद (Lap) पर रखकर किया जाता है, अतः इसे लैपटाॅप कम्प्यूटर (Laptop Computer) भी कहते हैं।
इसमें एक मुड़ने योग्य एलसीडी माॅनीटर, की-बोर्ड, टच पैड (Touch Pad), हार्डडिस्क, फ्लॉपी डिस्क ड्राइव, सीडी/ डीवीडी ड्राइव और अन्य पोर्ट (Port) रहते हैं। विद्युत के बगैर कार्य कर सकने के लिए इसमें चार्ज की जाने वाली बैटरी (Chargeable Battery) का प्रयोग किया जाता है। वाई- फाई (WiFi- Wireless Fidelity) और ब्लूटूथ (Bluetooth) की सहायता से इसे इंटरनेट से भी जोड़ा जा सकता है।

6. सुपर कम्प्यूटर (Super Computer)

यह अब तक का सबसे अधिक शक्तिशाली और महंगा कम्प्यूटर है। इसमें कई प्रोसेसर समानान्तर क्रम में लगे हैं। इस तरह इसमें मल्टी प्रोसेसिंग (Multi Processing) और समानान्तर प्रोसेसिंग (Parallel Processing) का उपयोग किया जाता है। समानान्तर प्रोसेसिंग में किसी कार्य को अलग- अलग टुकड़ों में तोड़कर उसे अलग-अलग प्रोसेसर द्वारा संपन्न कराया जाता है। इस पर कई व्यक्ति एक साथ कार्य (Multi user) कर सकते हैं। इसकी गणना क्षमता और मेमोरी अत्यंत उच्च होती है।
विश्व का प्रथम सुपर कम्प्यूटर क्रे. के.-1 एस (Cray K-1S) है जिसका निर्माण अमेरिका के क्रे. रिसर्च कम्पनी (Cray Research Company) ने 1979 में किया।
उपयोगः पेट्रोलियम उद्योग में तेल की खानों का पता लगाने, अंतरिक्ष अनुसंधान, मौसम, विज्ञान, भूगर्भीय सर्वेक्षण, स्वचालित वाहनों के डिजाइन तैयार करने, कम्प्यूटर पर परमाणु भट्टियों के सबक्रिटिकल परीक्षण (Subcritical Test) आदि में।

आधारभूत संरचना (Fundamental Units)


कम्प्यूटर छोटा हो या बड़ा, चाहे वह नया हो या पुराना, इसके पांच मुख्य भाग होते हैं:

1. इनपुट यूनिट (Input Unit)

डाटा, प्रोग्राम, अनुदेश (Instruction) और निर्देशों (Commands) को कम्प्यूटर में डालने के लिए प्रयोग की जाने वाली विद्युत यांत्रिक (Electromechanical) युक्ति इनपुट डिवाइस कहलाता है। चूंकि कम्प्यूटर केवल बाइनरी संकेतों (0 और 1 या आॅन और आॅफ) को समझ सकता है, अतः सभी इनपुट, आउटपुट इंटरफेस (Input Interface) की मदद से उसे बाइनरी संकेत में बदलते हैं।
इनपुट डिवाइस के कार्य
  1. डाटा, अनुदेशों तथा प्रोग्राम को स्वीकार करना,
  2. उन्हें बाइनरी कोड में बदलना,
  3. और बदले हुए कोड को कम्प्यूटर सिस्टम को देना।
कुछ प्रमुख इनपुट डिवाइस
  • की-बोर्ड
  • माउस
  • ज्वाॅस्टिक
  • प्रकाशीय पेन
  • स्कैनर
  • बार कोड रीडर
  • मइकर (MICR- Magnetic Ink Character Reader)
  • पंच कार्ड रीडर
  • आॅप्टिकल मार्क रीडर
  • आॅप्टिकल कैरेक्टर रीडर
  • माइक या माइक्रोफोन
  • स्पीच रिकाॅगनिशन सिस्टम

2. आउटपुट यूनिट (Output Unit)

यह कम्प्यूटर द्वारा प्रोसेस किए गए परिणामों को प्राप्त करने के लिए युक्ति है। यह कम्प्यूटर को उपयोगकर्ता के साथ जोड़ता है। चूंकि कम्प्यूटर से प्राप्त परिणाम बाइनरी संकेतों (0 और 1) में होते हैं, अतः उन्हें आउटपुट इंटरफेस द्वारा सामान्य संकेतों में परिवर्तित किया जाता हैं।
आउटपुट डिवाइस के कार्य
  1. सीपीयू से परिणाम प्राप्त करना
  2. प्राप्त परिणामों को मानव द्वारा समझे जा सकने वाले संकेतों में बदलना
  3. परिणाम के परिवर्तित संकेतों को उपयोगकर्ता तक पहुंचाना
कुछ प्रमुख आउटपुट डिवाइस
  • माॅनीटर
  • प्रिंटर
  • प्लाॅटर
  • स्पीकर
  • कार्ड रीडर
  • टेप रीडर
  • स्क्रीन इमेज प्रोजेक्टर

3. सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU) या सिस्टम यूनिट (System Unit)

कम्प्यूटर पर जो भी काम किए जाते हैं, वह सीपीयू में ही होता है। इसे कम्प्यूटर का मस्तिष्क भी कहा जाता है। इसका काम है किसी व्यक्ति द्वारा दिए गए आदेशों को समझकर उनका ठीक-ठीक पालन करना। जोड़ना, घटाना आदि अंकगणितीय क्रियाएं- दो संख्याओं की तुलना करना या किसी विशेष बात की जाँच करना, आदि इसका काम है।
कुछ प्रमुख माइक्रोप्रोसेसर या सीपीयू चिप
पेंटियम, पेंटियम प्रो, पेंटियम-III, पेंटियम-IV, डुअल कोर, आई 5, आई 7, इंटेल सेलराॅन, एएमडी एथलाॅन, एएमडी, डयूरान साइरिक्स.

4. अरिथमेटिक लाॅजिक यूनिट (ALU-Arithmetic Logic Unit)

इसके अंतर्गत कंप्यूटर सभी मैथमेटिकल और लाॅजिकल कार्य संपन्न करता है। जैसे कि संख्याओं को जोड़ना, घटाना और गुणा करना और फिर उनकी आपस में तुलना करना । इसके पश्चात कंप्यूटर का कंट्रोल यूनिट हरकत में आता है और प्रोसेसिंग के परिणामस्वरूप बने इलेक्ट्राॅनिक ट्रैफिक को कंट्रोल करने लगता है। यह कंट्रोल यूनिट अर्थमेटिक एंड लाॅजिक यूनिट (ALU) और मेन मेमोरी के बीच सामंजस्य पैदा करके सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट को संपूर्णता प्रदान करता है। इसी संपूर्णता की वजह से हमें कंप्यूटर से वास्तविक परिणाम प्राप्त होते हैं और यह कंट्रोल यूनिट ही इन परिणामों को आउटपुट उपकरणों तक पहंुचाता है, अर्थात कंट्रोल यूनिट, इनपुट डिवाइसेस, प्रोसेसिंग डिवाइसेस में भी ताल-मेल बिठाता है।

5. मेमोरी (Memory)

डाटा और अनुदेशों को प्रोसेस करने से पहले मेमोरी में रखा जाता है। प्रोसेस द्वारा प्राप्त अंतरिम और अंतिम परिणामों को भी मेमोरी में रखा जाता है।
इस प्रकार मेमोरी सुरक्षित रखता है:
  1. प्रोसेस के लिए दिए गए डाटा व अनुदेशों को
  2. अंतरिम परिणामों को
  3. अंतिम परिणामों को
मेमोरी को मुख्यतः दो भागों में बांटा जाता है
(i) प्राथमिक या मुख्य मेमोरी (Primary or Main memory):
यह कम्प्यूटर सिस्टम यूनिट के अंदर स्थित इलेक्ट्राॅनिक मेमोरी है। इसकी स्मृति क्षमता कम जबकि गति तीव्र होती है। इसमें अस्थायी निर्देशों और तात्कालिक परिणामों को संग्रहित किया जाता है। यह अस्थायी मेमोरी है जिसमें कम्प्यूटर को आॅफ कर देने पर सूचना भी समाप्त हो जाते हैं।
(ii) द्वितीयक या सहायक मेमोरी (Secondary or Auxiliary Memory):
यह मुख्यतः चुम्बकीय डिस्क या आॅप्टिकल डिस्क होता है जिसमें बड़ी मात्रा में सूचनाओं को संग्रहित किया जा सकता है। यह स्थायी मेमोरी है जिसमें विद्युत उपलब्ध न होने पर भी सूचनाओं का ह्रास नहीं होता

रैम (RAM) :

रैम को ज्यादातर मेमोरी कहा जाता है। रैम में मेमोरी चिप्स लगी होती है जिन्हें प्रोसेसर की मदद से पढ़ा और लिखा जा सकता है। जब कम्प्यूटर चालू किया जाता है तब कुछ आपरेटिंग सिस्टम्स फाइलें, स्टोरेज उपकरण जैसे हार्ड-डिस्क में लोड होकर रैम में आ जाती हैं। कम्प्यूटर चलने तक यह फाइले रैम में ही रहती हैं। कुछ अन्य प्रोग्राम और डाटा भी रैम में लोड हो जाते हैं।
जब तक डाटा रैम में होता है तो प्रोसेसर उसकी व्याख्या/ आकलन करता है। इस दौरान रैम के कंटेन्ट्स में बदलाव आ सकता है। रैम की क्षमता अगर ज्यादा है तो वह एक साथ कई प्रोग्रामों को संजोकर रख सकती है। जिस प्रोग्राम पर आप काम करते है वह कम्प्यूटर की स्क्रीन पर दिखायी देता हैं।
ज्यादातर रैम अस्थिर होती हैं। कम्प्यूटर के बंद होते ही यह अपनी कंटेन्ट्स खो देती है। इसलिए भविष्य में इस्तेमाल हेतु डाटा को सेव करना पड़ता है। रैम में मौजूदा वस्तुओं को हार्ड डिस्क पर काॅपी करने की प्रक्रिया को सेविंग कहते हैं।

रोम (ROM):

रोम स्टोरेज मीडिया की श्रेणी में आता है जिसका प्रयोग कम्प्यूटर और अन्य इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों में किया जाता है। रोम में उपस्थित डाटा में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। यह अस्थिर नहीं होती। कम्प्यूटर बंद हो जाने के बाद इसके कंटेन्ट्स खोते नहीं है।
रोम के चिप में स्थायी डाटा, निर्देश और सूचनाएं होती हैं। उदाहरण के तौर पर इसमें निर्देशों की शंृखला से युक्त बेसिक इनपुट/ आउटपुट सिस्टम होता है जिससे कम्प्यूटर स्टार्ट होते ही आॅपरेंटिंग सिस्टम और अन्य फाइलें लोड हो जाती हैं। अन्य कई उपकरणों में भी रोम की चिप लगी होती है। उदाहरण के लिए प्रिंटर में लगी रोम की चिप में फान्ट से संबंधित डाटा होता है।

कम्प्यूटर हाॅर्डवेयर (Computer Hardware)


कम्प्यूटर का घटक जिसे हम छू सकते हैं कम्प्यूटर हाॅर्डवेयर कहलाता हैं। कम्प्यूटर के मुख्य घटक हैं
  • सिस्टम यूनिट
  • माॅनीटर या वीडीयू
  • की- बोर्ड
  • माउस
  • हार्डडिस्क
मल्टीमीडिया में प्रयोग आने वाले कुछ घटक हैं
  • सीडी राॅम ड्राइव
  • स्पीकर
  • माइक
  • मोडेम
कम्प्यूटर में कुछ ऐच्छिक घटक हैं
  • प्रिंटर
  • फ्लॉपी ड्राइव
  • स्कैनर
  • ज्वाॅस्टिक
कम्प्यूटर को बिजली आपूर्ति के लिए
  • यूपीएस
  • सीवीटी
सिस्टम यूनिट के अन्य घटक
मदरबोर्ड (Mother-Board) : यह प्लास्टिक का बना पीसीबी होता है। धातु की पतली रेखाओं द्वारा यह दो उपकरणों के बीच संबंध स्थापित करता है। यह कम्प्यूटर का मुख्य पटल होता है। इस पर बनी धातु की पतली रेखाएं, जिनके माध्यम से मदरबोर्ड पर बने विभिन्न उपकरणों के बीच संकेतों का आदान-प्रदान होता है, बस (Bus) कहलाते हैं।
मदरबोर्ड को मेनबोर्ड या सिस्टम बोर्ड कहा जाता है। यह मुख्य बोर्ड होता है जिसमें साॅकेट लगे होते हैं और इससे अन्य बोर्ड भी जुड़ सकते हैं। मदरबोर्ड में कई तरह की चिप्स लगी होती हैं जिसमें से प्रोसेसर या सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट मुख्य हैं।
पाॅवर सप्लाई यूनिट (Power Supply Unit): इसे घरेलू बिजली से 220V AC सप्लाई दी जाती है जिसे यह कम्प्यूटर में प्रयोग के लिए 5 वोल्ट और 12 वोल्ट DC में बदल देता है। कम्प्यूटर के इलेक्ट्राॅनिक घटकों को 5 वोल्ट सप्लाई दी जाती है जबकि इसके मोटर, पंखे आदि का इसमें 12 वोल्ट की सप्लाई दी जाती है। यह कम्प्यूटर को उच्च व निम्न वोल्टेज की गड़बड़ियों से बचाता है। इसे वायु के सहारे ठंडा (Air Cooled) करने के लिए बिजली का एक पंखा (Fan) लगा रहता है। इसमें एसएमपीएस (SMPS- Switch Mode Power Supply) का प्रयोग किया जाता है।
सीपीयू (CPU-Central Processing Unit) : इसे माइक्रो प्रोसेसर (Micro Processor) भी कहा जाता है। यह एक चिप होता है जो कम्प्यूटर के विभिन्न उपकरणों का नियंत्रण तथा समन्वय करता है। कार्यों को नियंत्रित करने के लिए इसमें कंट्रोल यूनिट (Control Unit) तथा अंकगणितीय गणनाओं और कुछ लाॅजिकल कार्यों के लिए अरिथमैटिक लाॅजिक यूनिट (Arithmetic Logic Unit ALU) रहता है। कम्प्यूटर की मुख्य मेमोरी भी सीपीयू में ही रहती है।
मैथ कोप्रोसेसर (Math Coprocessor): गणित के कार्यों को करने तथा सीपीयू की सहायता के लिए मैथ को प्रोसेसर का उपयोग किया जाता है। नये माइक्रो प्रोसेसर में इसे अलग से लगाने की जरूरत नहीं होती।
रैम चिप (RAM Chip): सिस्टम यूनिट के मदरबोर्ड पर रैम चिप लगाने के खाके बने रहते हैं, जिनमें आवश्यकतानुसार रैम चिप लगाये जा सकते हैं। यहां कार्य के दौरान डाटा व प्रोग्राम को अस्थाई तौर पर रखा जाता है।
राॅम चिप (ROM Chip): निर्माण के समय ही इसमें डाटा डालकर मदरबोर्ड पर स्थायी तौर पर लगा दिया जाता है। इस चिप में ऐसे डाटा और प्रोग्राम रखे जाते है जिनकी आवश्यकता पीसी को चालू करते ही पड़ती है।
स्पीकर (Speaker): सिस्टम यूनिट के अंदर कुछ ध्वनि संकेत उत्पन्न करने के लिए स्पीकर लगा रहता है।
टाइमर (Timer): यह मदरबोर्ड पर लगा रहता है तथा घड़ी की तरह कार्य करता है। इसे एक बटन बैटरी से सप्लाई दी जाती है ताकि कम्प्यूटर बंद हो जाने पर भी घड़ी कार्य करती रहे।
एक्सपैंशन स्लाट (Expansion Slot): मदरबोर्ड पर किसी अन्य उपकरण को जोड़ने या भविष्य में प्रयोग के लिए खाने बने रहते हैं जिन्हें एक्सपेंशन स्लाट कहते हैं।
हार्ड डिस्क (Hard Disk): यह बड़ी क्षमता का स्टोरेज डिवाइस है जो डाटा और प्रोग्राम को संग्रहित रखता है। सप्लाई बंद कर देने पर भी इसमें संग्रहित डाटा समाप्त नहीं होता। सभी सॉफ्टवेयर प्रोग्राम यहीं रखे जाते हैं। आजकल हार्ड डिस्क की क्षमता जीबी में आंकी जाती है।
फ्लॉपी डिस्क ड्राइव (Floppy Disk Drive): यह फ्लॉपी डिस्क को पढ़ने और उसमें परिवर्तन करने के लिए प्रयोग किया जाता है। नये मेमोरी डिवाइस के आविष्कार से इसका प्रयोग घटता जा रहा है।
सीडी राॅम ड्राइव (CD-ROM Drive): इसका प्रयोग सीडी पर बनी सूचनाओं को पढ़ने के लिए किया जाता है। इसकी गति को एक नम्बर और उसके बाद अक्षर X से दर्शाया जाता है। जैसे 8X, 56X आदि। आजकल पढ़ने के अलावा सीडी पर लिखने योग्य ड्राइव भी उपलब्ध है। जिसे ‘सीडी-आर/डब्लू’ (CD- R/W-Computer Disk-Read/write) कहा जाता है।
प्रिंटर (Printer): यह हार्ड कापी प्रदान करने वाला आउटपुट डिवाइस है। इसे सिस्टम यूनिट से जोड़ा जाता है।
स्कैनर (Scanner): यह ऐच्छिक इनपुट डिवाइस है जिसका उपयोग ग्राफ या चित्र को बाइनरी डाटा में बदलकर कम्प्यूटर में डालने के लिए किया जाता है।
माॅडेम (Modem): यह (Modulator Demodulator) का संक्षिप्त रूप है। पीसी को नेट (इन्टरनेट) के साथ जोड़ने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह टेलीफोन लाइन पर आने वाली एनालाॅग संकेतों को डिजिटल संकेतों में बदलकर कम्प्यूटर को देता है तथा कम्प्यूटर द्वारा उत्पन्न डिजिटल संकेतों को एनालाॅग संकेत में बदलकर लाइन पर भेजता है।
माॅनीटर (Monitor): यह पीसी का मुख्य आउटपुट डिवाइस है जिससे प्रयोग कर्ता और कम्प्यूटर के बीच संबंध स्थापित होता है। यह कम्प्यूटर में चल रहे कार्यों को दर्शाता है। मल्टीमीडिया में एनीमेशन, चलचित्र (Movie), छायाचित्र (Image) और रेखाचित्र (Graphics) के चलते इसका महत्व बढ़ गया है। जीयूआई (GUI–Graphical User Interface) में भी इसका बड़ा महत्व है।
माॅनीटर के गुणवत्ता की पहचान पिक्सेल या डाॅट पिच (Pixel or dot pitch) तथा रिजोल्यूशन (Resolution) तथा रिफ्रेश रेट (Refresh Rate) द्वारा की जाती है।
माउस (Mouse): यह एक इनपुट डिवाइस है। इसे प्वाइंटिंग डिवाइस भी कहते हैं। इसमें दो या तीन बटन होते हैं। यह सीपीयू से जुड़ा रहता है। जीयूआई के कारण इसका महत्व बढ़ा है।
की-बोर्ड (Key Board): यह एक महत्वपूर्ण इनपुट डिवाइस और पीसी का आवश्यक अंग है। इसकी सहायता से डाटा को कम्प्यूटर में डाला जाता है। कम्प्यूटर को दिए जाने वाले निर्देशों को भी की-बोर्ड की सहायता से दिया जाता है। माउस के खराब हो जाने पर की-बोर्ड को माउस की जगह थोड़ी मुश्किल से प्रयोग किया जा सकता है।
यूपीएस (UPS–Uniterruptible Power Supply): बिजली की सप्लाई बंद हो जाने पर कम्प्यूटर को अचानक रूक जाने से रोकने के लिए यूपीएस का प्रयोग किया जाता है। इसमें एक रीचार्जेबल बैटरी होती है जो कम्प्यूटर को लगातार सप्लाई देती रहती है। कम्प्यूटर के अचानक बंद हो जाने पर किए जा रहे कार्यों के समाप्त होने और डिस्क के खराब होने का खतरा बना रहता है।
इसे रोकने के लिए यूपीएस का प्रयोग किया जाता है । जब बैटरी की क्षमता कम होने लगती है तो यूपीएस ध्वनि संकेत देकर उपयोगकर्ता को कम्प्यूटर बंद करने के लिए चेतावनी देता है।
सीवीटी (CVT- Constant Voltage Transformer): इसका प्रयोग घरेलू सप्लाई में होने वाले वोल्टेज के उत्तार चढ़ाव को रोकने के लिए किया जाता है ताकि कम्प्यूटर को एक समान बिजली मिलती रहे।

कम्प्यूटर की विशेषता (Characteristics of Computer)


गति (Speed) : कम्प्यूटर एक सेकेण्ड में लाखों गणनाएं कर सकता है। किसी मनुष्य द्वारा पूरे वर्ष में किए जाने वाले कार्य को कम्प्यूटर कुछ ही सेकेण्ड में कर सकता है। कम्प्यूटर प्रोसेसर के स्पीड को हर्ट्ज़ (Hz) में मापते है वर्तमान समय में कम्प्यूटर नैनो-सेकेण्ड (10–9सेकेण्ड) में गण्नाएं कर सकता है।
त्रुटि रहित कार्य (Accuracy) : कम्प्यूटर की गणनाएं लगभग त्रुटिरहित होती हैं। गणना के दौरान अगर कोई त्रुटि (error) पायी भी जाती है तो वह प्रोग्राम या डाटा में मानवीय गलतियों के कारण होती है। अगर डाटा और प्रोग्राम सही है तो कम्प्यूटर हमेशा सही परिणाम ही देता है। कभी-कभी वायरस है तो कम्प्यूटर हमेशा सही परिणाम नहीं देता है। कभी-कभी वायरस के कारण भी कम्प्यूटर में त्रुटियां आ जाती है।
स्थायी भंडारण क्षमता (permanent Storage) : कम्प्यूटर में प्रयुक्त मेमोरी को डाटा, सूचना और निर्देशों के स्थायी भंडारण के लिए प्रयोग किया जाता है। चूंकि कम्प्यूटर में सूचनाएं इलेक्ट्राॅनिक तरीके से संग्रहित की जाती है, अतः सूचना के समाप्त होने की संभावना कम रहती है।
विशाल भंडारण क्षमता (Large Storage Capacity) : कम्प्यूटर के बाह्य (external) तथा आंतरिक (internal)संग्रहण माध्यमों (हार्ड डिस्क, फ्लॉपी डिस्क, मैग्नेटिक टेप,सीडी राॅम) में असीमित डाटा और सूचनाओं का संग्रहण किया जा सकता है । कम्प्यूटर में कम स्थान घेरती सूचनाओं का संग्रहण किया जा सकता है। अतः इसकी भंडारण क्षमता विशाल और असीमित है।
भंडारित सूचना को तीव्रगति से प्राप्त करना (Fast Retrieval): कम्प्यूटर प्रयोग द्वारा कुछ ही सेकेण्ड में भंडारित सूचना में से आवश्यक सूचना को प्राप्त किया जा सकता है। रेम (RAM- Random Access Memory) के प्रयोग से वह काम और भी सरल हो गया है।
जल्द निर्णय लेने की क्षमता (Quick Decision) : कम्प्यूटर परिस्थितियों का विश्लेषण पूर्व में दिए गए निर्देशों के आधार पर तीव्र निर्णय की क्षमता से करता है।
विविधता (Versatility) : कम्प्यूटर की सहायता से विभिन्न प्रकार के कार्य संपन्न किये जा सकते हैं। आधुनिक कम्प्यूटरों में अलग-अलग तरह के कार्य एक साथ करने की क्षमता है।
पुनरावृति (Repetition) : कम्प्यूटर आदेश देकर एक ही तरह के कार्य बार-बार विश्वसनीयता और तीव्रता से कराये जा सकते हैं।
स्फूर्ति (Agility) : कम्प्यूटर को एक मशीन होने के कारण मानवीय दोषों से रहित है। इसे थकान तथा बोरियत महसूस नहीं होती है और हर बार समान क्षमता से कार्य करता है।
गोपनीयता (Secrecy) : पासवर्ड के प्रयोग द्वारा कम्प्यूटर के कार्य को गोपनीय बनाया जा सकता है। पासवर्ड के प्रयोग से कम्प्यूटर में रखे डाटा और कार्यक्रमों को केवल पासवर्ड जानने वाला व्यक्ति ही देख या बदल सकता है।
कार्य की एकरूपता (Uniformity of work) : बार-बार तथा लगातार एक ही कार्य करने के बावजूद कम्प्यूटर के कार्य की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

कम्प्यूटर के अनुप्रयोग (Applications of Computer)


कम्प्यूटर का प्रयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है। वर्तमान में, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। निम्नलिखित क्षेत्रों में कम्प्यूटर का विभिन्न अनुप्रयोग किया जा रहा है
डाटा प्रोसेसिंग (Data Processing) : बड़े और विशाल सांख्यिकीय डाटा से सूचना तैयार करने में कम्प्यूटर का प्रयोग किया जा रहा है। जनगणना, सांख्यिकीय विश्लेषण, के परिणाम आदि में इसका प्रयोग किया जा रहा है।
सूचनाओं का आदान-प्रदान (Exchange of Information) : भंडारण की विभिन्न पद्धतियों के विकास और कम स्थान घेरने के कारण से सूचनाओं के आदान प्रदान के बेहतर माध्यम साबित हो रहे हैं। इंटरनेट के विकास ने तो इसे ‘सूचना का राजमार्ग’ (Information Highway) बना दिया है।
शिक्षा (Education) : मल्टीमीडिया (Multimedia) के विकास और कम्प्यूटर से आधारित शिक्षा ने इसे विद्यार्थियों के लिए उपयोगी बना दिया है। डिजिटल लाइब्रेरी ने फस्तकों की सर्वसुलभता सुनिश्चित की है।
वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific Research) : बिज्ञान के अनेक जटिल रहस्यों को सुलझाने में कम्प्यूटर की सहायता ली जा रही है। कम्प्यूटर परिस्थितियों का उचित आकलन भी संभव हो पाता है।
रेलवे और वायुयान आरक्षण (Railway and Airlines Reservation): कम्प्यूटर की सहायता से किसी भी स्थान से अन्य स्थानों के रेलवे और वायुयान के टिकट लिए जा सकते हैं तथा इसमें गलती की संभावना भी नगण्य है।
बैंक (Banks) : कम्प्यूटर के अनुप्रयोग ने बैंकिंग क्षेत्र में क्रांति ला दी है। एटीएम तथा आॅनलाइन बैंकिंग, चेक के भुगतान, रुपया गिनना तथा पासबुक इंट्री में कम्प्यूटर का प्रयोग किया जा रहा है।
चिकित्सा (Medicine) : शरीर के अंदर के रोगों का पता लगाने, उनका विश्लेषण और निदान में कम्प्यूटर का विस्तृत प्रयोग हो रहा है। सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे तथा विभिन्न जाँच में कम्प्यूटर का प्रयोग हो रहा है।
रक्षा (Defence) : रक्षा अनुसंधान, वायुयान नियंत्रण, मिसाइल, राडर आदि में कम्प्यूटर का प्रयोग किया जा रहा है।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (Space Technology) : कम्प्यूटर की तीव्र गणना क्षमता के कारण ही ग्रहों, उपग्रहों और अंतरिक्ष की घटनाओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जा सकता है। कृत्रिम उपग्रहों में भी कम्प्यूटर का विशेष प्रयोग हो रहा है।
संचार (Communication) : आधुनिक संचार व्यवस्था कम्प्यूटर के प्रयोग के बिना संभव नहीं है। टेलीफोन और इंटरनेट ने संचार क्रांति को जन्म दिया है। तंतु प्रकाशिकी संचरण (Fiber-optics communication) में कम्प्यूटर का प्रयोग किया जाता है।
उद्योग व व्यापार (Industry & Business) : उद्योगों में कम्प्यूटर के प्रयोग से बेहतर गुणवत्ता वाले वस्तुओं का उत्पादन संभव हो पाया है। व्यापार में कार्यों और स्टाॅक का लेखा- जोखा रखने में कम्प्यूटर सहयोगी सिद्ध हुआ है।
मनोरंजन (Recreation) : सिनेमा, टेलीविजन के कार्यक्रम, वीडियो रोम में कम्प्यूटर का उपयोग कर प्रभावी मनोरंजन प्रस्तुत किया जा रहा है। मल्टीमीडिया के प्रयोग ने कम्प्यूटर को मनोरंजन का उत्तम साधन बना दिया है।

सॉफ्टवेयर (Software)


सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामों के नियम व क्रियाओं का वह समूह है जो कम्प्यूटर सिस्टम के कार्यों को नियंत्रित करता है तथा कम्प्यूटर के विभिन्न हार्डवेयरों के बीच समन्वय स्थापित करता है, ताकि किसी विशेष कार्य को पूरा किया जा सके। इस तरह सॉफ्टवेयर वह निर्देश है जो हार्डवेयर से निर्धारित कार्य कराने के लिए उसे दिए जाते हैं। अगर हार्डवेयर इंजन है तो सॉफ्टवेयर उसका ईंधन। साधरणतः प्रोग्राम (Program), अप्लिकेशन (Application) और सॉफ्टवेयर (Software) एक ही चीज को इंगित करता है।

सिस्टम सॉफ्टवेयर (System Software)

प्रोग्रामों का समूह जो कम्प्यूटर सिस्टम के मूलभूत कार्यों को संपन्न करने तथा उन्हें कार्य के लायक बनाए रखने के लिए तैयार किया जाता है, सिस्टम सॉफ्टवेयर कहलाता है। यह कम्प्यूटर तथा उपयोगकर्ता के बीच माध्यम का कार्य करता है। सिस्टम से सॉफ्टवेयर का विकास किया जाता है।

अप्लिकेशन सॉफ्टवेयर (Application Software)

यह प्रोग्रामों का समूह है जो किसी विशिष्ट कार्य के लिए तैयार किया जाता हैं। संस्थान, व्यक्ति या कार्य को देखकर आवश्यकतानुसार इस सॉफ्टवेयर का विकास किया जाता है।

यूटीलिटी सॉफ्टवेयर (Utility Software)

यह कम्प्यूटर के कार्य को सरल बनाने, उसे अशुद्धियों से दूर रखने तथा सिस्टम के विभिन्न सुरक्षा कार्यों के लिए बनाया गया सॉफ्टवेयर हैं। इसका उपयोग कई अप्लिकेशन सॉफ्टवेयरों में किया जा सकता है।
प्रोग्रामिग लेंग्वेजेस (Programming Languages)
प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेस में मशीन लैंग्वेजेस, असेंबली लैंग्वेजेस थर्ड- जेनरेशन लैंग्वेजेस, फोर्थ- जेनरेशन लैंग्वेजेस, और नेचुरल लैंग्वेजेस नाम की पांच मुख्य लैंगवेजेस हैं। मशीन व असेंबली लैंग्वेजेस लो (low) लेवल लैंग्वेजस मानी जाती है। थर्ड जेनरेशन लैंग्वेजेस फोर्थ- जेनरेशन लैंग्वेजेस और नेचुरल लेंग्वेजेस, हाई – लेवल लैंग्वेजेस हैं। लो-लेवल लैंग्वेजेस एक खास प्रकार के कम्प्यूटर को चलाने के लिए बनाई जाती है। हाई- लेवल लैंग्वेजेस कई विभिन्न प्रकार के कम्प्यूटरों को चला सकती हैं।
मशीन लैंग्वेज (Machine Language)
फर्स्ट-जेनरेशन लेंग्वेज के नाम से मशहूर मशीन लेंग्वेज अकेली लेंग्वेज है, जिसे कम्प्यूटर सीधा समझता है।
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आॅपेरेटिंग सिस्टम (Operating System)


यह प्रोग्रामों का वह समूह है जो कम्प्यूटर सिस्टम तथा उसके विभिन्न संसाधनों के कार्यों को नियंत्रित करता है तथा हार्डवेयर, अप्लिकेशन सॉफ्टवेयर तथा उपयोगकर्ता के बीच संबंध स्थापित करता है। यह विभिन्न अप्लिकेशन प्रोग्रामों के बीच समन्वय भी स्थापित करता हैं।

आॅपरेटिंग सिस्टम के मुख्य कार्य

  • कम्प्यूटर चालू किये जाने पर सॉफ्टवेयर को द्वितीयक मैमोरी से लेकर प्राथमिक मैमोरी में डालना तथा कुछ मूलभूत क्रियाएं स्वतः प्रारंभ करना।
  • हार्डवेयर और उपयोगकर्ता के बीच संबंध स्थापित करना।
  • हार्डवेयर संसाधनों का नियंत्रण तथा बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना।
  • अप्लिकेशन प्रोग्राम का क्रियान्वयन करना।
  • हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर से संबंधित कम्प्यूटर के विभिन्न दोषों (errors) को इंगित करना।

आॅपरेंटिंग सिस्टम के प्रकार (Types of Operating System)

1. बैच आॅपरेटिंग सिस्टम (Batch Operating System)

इसमें एक ही प्रकृति के कार्यों को एक बैच के रूप में संगठित कर समूह में क्रियान्वित किया जाता है। इसके लिए बेच माॅनीटर सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता है।
उपयोगः इस सिस्टम का प्रयोग ऐसे कार्यों के लिए किया जाता है जिनमें मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती। जैसे- संाख्यिकीय विश्लेषण (Statistical Analysis), बिलप्रिंट करना, पेरोल (Payroll) बनाना आदि ।

2. मल्टी प्रोग्रामिंग आॅपरेटिंग सिस्टम (Multi Programming Operating System):

इस प्रकार के आॅपरेटिंग सिस्टम में एक साथ कई कार्यों को सम्पादित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी एक प्रोग्राम के क्रियान्वयन के बाद जब उसका प्रिंट लिया जा रहा होता है तो प्रोसेसर खाली बैठने के स्थान पर दूसरे प्रोग्राम का क्रियान्वयन आरंभ कर देता है जिसमें प्रिंटर की आवश्यकता नहीं होती है। इससे क्रियान्वयन में लगने वाला कुल समय कम हो जाता है तथा संसाधनों का बेहतर उपयोग भी संभव हो पाता है।
आधुनिक कम्प्यूटर में मुख्यतौर पर मल्टी प्रोग्रामिंग आॅपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। विण्डोज (Windows) और लाइनक्स (Linux) मल्टी प्रोग्रामिंग आॅपरेटिंग सिस्टम हैं जिनमें एक साथ कई प्रोग्राम चलाये जा सकते हैं।
लाइनक्स (Linux) विण्डोज के समान एक शक्तिशाली आॅपरेटिंग सिस्टम है जो मुफ्त उपलब्ध है, जबकि विण्डोज के लिए शुल्क चुकाना पड़ता है। इसके बावजूद लाइनक्स का प्रचलन सीमित है।

विण्डोज आॅपरेंटिंग सिस्टम के मुख्य भाग

बूटिंग (Booting): कम्प्यूटर को चालू किये जाने पर वह स्वतः विण्डोज प्रोग्राम को द्वितीयक मेमोरी से लेकर प्राथमिक या मुख्य मेमोरी में संग्रहित करता है। इस प्रक्रिया को बूटिंग कहते हैं।

विण्डोज के भाग (Parts of Windows):

विण्डोज को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित मुख्य भागों में बांटा जाता है:
डेस्कटाॅप (Desk top): यह माइक्रोसॉफ्ट विण्डोज का वह भाग है जो सॉफ्टवेयर खुलने के बाद सबसे पहले कम्प्यूटर पर दिखाई देता है। डेस्क टाॅप पर उपस्थित कुछ प्रमुख भाग हैं:
  • My Computer
  • Recycle Bin
  • My Network Places
  • Documents
  • Internet Explorer
  • Start Menu
  • Task Bar
  • Files and Folders आदि
माई कम्प्यूटर (My computer): यह कम्प्यूटर में संग्रहित सभी सूचनाओं को प्रदर्शित करता है। इसमें ड्राइव, कंट्रोल पैनल, प्रिंटर आदि का आइकन होता है।
रिसाइकिल बिन (Recycle Bin): यहाँ उपयोग के दौरान कम्प्यूटर से हटाई (Deleted) गयी सभी फाइलें अस्थायी तौर पर रहती हैं। आवश्यकता पड़ने पर हटायी गयी वस्तु को Restore द्वारा वापस भी लाया जा सकता है। हटाई गयी वस्तु को कम्प्यूटर से पूरी तरह नष्ट करने के लिए रिसाइकिल बिन को खाली (Empty Recycle Bin) किया जाता है।
टास्क बार ( Task bar): यह विण्डोज डेस्कटाॅप के सबसे नीचे स्थित पतली पट्टी है। इस पर स्टार्ट (Start) बटन, वर्तमान में चालू प्रत्येक प्रोग्राम के लिए एक बटन, घड़ी तथा कुछ अन्य शार्टकट आइकन रहते हैं। टास्क बार का प्रयोग कर खुले हुए प्रोग्रामों को एक विण्डों में आसानी से लाया जा सकता है।
स्टार्ट मेन्यू (Start Menu): टास्क बार के बायें कोने पर स्टार्ट बटन रहता है जिसे बायें क्लिक कर स्टार्ट मेन्यू खोला जा सकता है। इसका प्रयोग विभिन्न प्रोग्राम या अप्लिकेशन को आरंभ करने के लिए किया जाता है। यह कम्प्यूटर में उपलब्ध विभिन्न प्रोग्रामों को सूची प्रदर्शित करता है।
स्टार्ट मेन्यू के कुछ मुख्य विकल्प हैं:
  • Shut Down: कम्प्यूटर को बंद करने, स्टैण्ड बाई मोड में लाने, पुनः चालू करने या एमएस डाॅस मोड में पुनः चालू करने के लिए प्रयुक्त।
  • Log off/ Log on: अनेक व्यक्तियों द्वारा प्रयोग किये जाने की स्थिति में अपने पसंद के डेस्कटाॅप के साथ खुलना या इंटरनेट से बाहर / जुड़ने का कार्य।
  • Run: प्रोग्राम के क्रियान्वयन का आदेश।
  • Help: विण्डोज से प्रोग्राम संबंधी जानकारी प्राप्त करना।
  • Search: किसी फोल्डर, फाइल या संदेश को ढूंढ़ना।
  • Settings: कम्प्यूटर की सेटिंग में बदलाव किये जा सकने वाले कार्यों की सूची।
  • Documents: हाल ही में प्रयोग किये गये दस्तावेजों की सूची।
  • Programs: कम्प्यूटर में उपलब्ध प्रोग्रामों की सूची जिन्हें इच्छानुसार चालू किया जा सकता है।
टाइटल बार (Title Bar): यह विण्डोज के सबसे ऊपर निम्न क्षैतिज पट्टी है। इस पर चालू प्रोग्राम का नाम लिखा रहता है। सक्रिय विण्डों के टाइटल बार का रंग गहरा जबकि निष्क्रिय विण्डों के टाइटल बार का रंग हल्का होता है।
टाइटल बार के दायें कोने पर विण्डोज को न्यूनतम, अधिकतम तथा बंद करने के बटन होते हैं
अधिकतम बटन से विण्डो पूरी स्क्रैन के बराबर हो जाती है। अब यह बटन रिस्टोर के रूप में बदल जाता है जिसे क्लिक कर विण्डो को पिछली स्थिति में लाया जा सकता है।
बंद बटन से खुले प्रोग्राम के कार्य को समाप्त कर विण्डो बंद किया जा सकता है। बटन को दबाने पर Save /Save As डाॅयलाग बाॅक्स आता है उसके निवारण के बाद विण्डो बंद हो जाती है।
स्क्राॅल बार (Scroll bar): अगर विण्डो में प्रदर्शित सूचना का आकार विण्डो के आकार से बड़ा हो तो सूचना को ऊपर-नीचे या दांये -बांये करने के लिए स्क्राॅल बार का प्रयोग किया जाता है।
स्क्राॅल बार दो तरह के होते हैं
  1. ऊर्ध्वाधर (Vertical) स्क्राॅल बारः इससे सूचना को ऊपर नीचे खिसकाया जा सकता है
  2. क्षैतिज (Horizontal) स्क्राॅल बारः इससे सूचना को दांये-बांये खिसकाया जा सकता है।
स्क्रॅाल बार में एक आयताकार बाॅक्स होता हैं जिसे इलीवेटर (Elevator) कहते हैं। इसे माउस द्वारा खींचकर सूचना को आगे- पीछे किया जा सकता है। इलीवेटर के दोनों ओर तीर के चिन्ह के साथ एक वर्गाकार बाॅक्स होता है जिसे स्क्राॅल बटन (Scroll button) कहते हैं। इस पर क्लिक कर सूचना को तीर की दिशा में खिसकाया जा सकता है
टूल बार (Tool Bar): विण्डोज में टाइटिल बार के नीचे एक पतली पट्टी होती है जिस पर उस प्रोग्राम में अक्सर प्रयोग में लाये जाने वाले आदेशों का आइकन बना रहता है। इसे टूल बार कहते हैं। टूल बार के बटन या आइकन प्रोग्राम के अनुसार बदलते रहते हैं। टूल बार में बटंनों को अपनी आवश्यकतानुसार जोड़ा या हटाया जा सकता है
मेन्यू बार (Menu Bar): टाइटल बार के नीचे एक पतली पट्टी होती है जिसमें कई प्रोग्राम, फाइलें, विकल्पों या आदेशों की सूची बनी रहती है जिसमें से किसी एक का चयन कर उस कार्य को क्रियान्वित किया जा सकता है। मेन्यू बार विकल्प प्रोग्राम के अनुसार बदलते रहते हैं।
स्टेटस बार (Status Bar): यह टास्क बार के ठीक ऊपर अवस्थित होता है तथा डाक्यूमेंट में पेज, सेक्शन, लाइन तथा काॅलम के हिसाब से कर्सर की स्थिति बताता है।
मेन्यू (Menu): यह विकल्पों या आदेशों की सूची है जिसमें से किसी एक का चयन किया जा सकता है। मेन्यू दो प्रकार के होते हैंः
  1. पुल / ड्राॅप डाउन मेन्यू (Pull/Drop Down Menu): किसी विषय को क्लिक करने पर यह मेन्यू उस विषय के नीचे प्रदर्शित होता है।
  2. पुल / अप मेन्यू (Pull/up Menu): किसी विषय को क्लिक करने पर यह उस विषय के ऊपर प्रदर्शित होता है।
किसी मेन्यू या उसके विकल्प को दो तरीके से खोला जा सकता हैः
  1. विकल्प पर माउस द्वारा क्लिक करके
  2. ALT बटन के साथ विकल्प का रेखांकित (Under lined) अक्षर दबाने पर, जैसे View मेन्यू खोलने के लिए ALT+ V दबाया जाता है।

वर्ड प्रोसेसिंग (Word Processing)


कंप्यूटर पर गणनाओं के अतिरिक्त सबसे पहले जो कार्य संपन्न हुआ था वह वर्ड प्रोसेसिंग ही था। कैलकुलेशन करने के पश्चात लोगों ने इसका प्रयोग चिट्ठी लिखने जैसे कार्यों के लिए प्रारंभ किया और इससे संबंधित एप्लीकेशन सॉफ्टवेयरों का निर्माण किया। पीसी के प्रारंभ में वर्ड प्रोसेसिंग के वर्ड स्टार और वर्ड परफेक्ट जैसे सॉफ्टवेयर इस्तेमाल होते थे। लेकिन वर्तमान समय में इस कार्य के लिए विंडोज़ पर आधारित सॉफ्टवेयरों का प्रयोग किया जाता है और इनमें सबसे ज्यादा माइक्रोसॉफ्ट आॅफिस के भाग माइक्रोसॉफ्ट वर्ड को इस्तेमाल करते हैं। वर्ड प्रोसेसिंग को जब हम परिभाषित करते हैं तो सीधा सा अर्थ यह है कि कंप्यूटर के द्वारा टाइपिंग का कार्य करना और उसे विधिवत लेआउट में सजाना । वर्तमान समय में वर्ड प्रोसेसिंग इतनी आगे चली गई है कि अब हम इसे मंुह से बोलकर भी संपन्न कर सकते हैं। वर्ड प्रोसेसिंग के अंतर्गत जब हम टेकस्ट टाइप करते हैं तो उसे अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी तरफ एलाइन कर सकते हैं। एलाइन करने का अर्थ होता है कि सभी लाइनों को एक तरफ करके पंक्तिबद्ध करना।

वर्ड प्रोसेसिंग की अन्य खूबियां

आॅटो करेक्शन
जब हम कंप्यूटर में माइक्रोसॉफ्ट वर्ड के द्वारा वर्ड प्रोसेसिंग का काम करते हैं तो हमें इसमें एक विशेष सुविधा मिलती है। जिसकी वजह से कंप्यूटर हमारे द्वारा टाइपिंग में की गई व्याकरण संबंधी गलतियों और कैप्टलाइजेशन संबंधी गलतियों को पहचान करके खुद ही ठीक करता है। इसके अलावा यदि किसी शब्द की स्पेलिंग गलत है तो यह हमारे सामने कुछ ऐसे शब्द लाता है जो उस गलत शब्द से मिलते-जुलते हैं जबकि यह उनके सही रूप होते हैं। आप इनमें से अपनी पसंद का सही शब्द चुनकर उसे दस्तावेज़ में जोड़ सकते हैं। आॅटो करेक्ट नामक यह सुविधा कंप्यूटर के वर्ड प्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर में जुड़ी मुख्य डिक्शनरी का प्रयोग करती है।
आप अब कंप्यूटर में अलग-अलग भाषाओं में भी वर्ड प्रोसेसिंग की आॅटो करेक्शन सुविधा इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन आपको ऐसा करने के लिए उससे संबंधित डिक्शनरी को कंप्यूटर में इंस्टाॅल करना होगा। माइक्रोसॉफ्ट ने इस कार्य के लिए एक प्रूपिंफग टूल किट बनाई है जिससे आप इसके वेबसाइट से अपने कंप्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं।
आॅटो फाॅर्मेट
फाॅर्मेटिंग के लिए अब आपको कोई विशेष मेहनत करने की जरूरत नहीं है माइक्रोसॉफ्ट वर्ड स्वतः टेक्स्ट फाॅर्मेट करने की शक्ति से संपन्न है। आप इसमें दी हुई सूची में फाॅर्मेटिंग को सेट करके उसे दस्तावेज पर बहुत ही सरलतापूर्वक इस्तेमाल कर सकते हैं।
आॅटो कम्पीलट
वर्ड प्रोसेसिंग के तहत अब आपको पूरा शब्द टाइप करने की जरूरत नहीं है यदि आपने कोई शब्द टाइप करना प्रारंभ किया है तो कंप्यूटर स्वयं ही पूरा शब्द लेकर आपके सामने आता है जिस पर क्लिक करके आप अपने अधूरे शब्द को पूरा कर सकते हैं। ऐसा करने से स्पेलिंग की गलती की संभावना बहुत कम हो जाती है।
आॅटो समराइजे़शन
वर्ड प्रोसेसिंग के साथ अब यह एक नई सुविधा जुड़ी है। जो आपके दस्तावेज़ का सारांश विश्लेषण के साथ आपके सामने प्रस्तुत कर सकती है। आप इस सुविधा का प्रयोग करके अपने दस्तावेज के कुछ खास बिंदुओं को हाईलाइट कर सकते हैं और उन्हें खास स्तर पर भी रख सकते हैं। इससे आपको यह पता चल जाता है कि आपके द्वारा बनाए हुए दस्तावेज में कौन-कौन से तत्व किस मात्रा में उपलब्ध हैं।
आॅटोमेटिक स्टाइल
वर्ड के नए संस्करण में फाॅर्मेटिंग के लिए आॅटोमेटिक स्टाइलों को जोड़ा गया है। जिसकी मदद से आप नई फाॅर्मेटिंग के लिए नया स्टाइल बहुत ही आसानी से बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त आप किए गए परिवर्तन को दर्शाने के लिए स्टाइल को फिर से परिभाषित कर सकते हैं, और फाॅर्मेटिंग टूलबार में दी हुई सूची से आप सभी स्टाइलों को आप जरूरत पड़ने पर देख सकते हैं।

वर्ड में कार्य करना

माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में काय के लिए हमें सबसे पहले कंप्यूटर को आॅन करना होगा। कंप्यूटर को आॅन करते ही हमारे सामने विंडोज़ का डेस्कटाॅप आ जाएगा। यदि इस डेस्कटाॅप में शार्टकट के रूप में माइक्रोसॉफ्ट वर्ड का कोई आइकाॅन है तो आप इस पर क्लिक करके इसे क्रियान्वित कर सकते हैं और यदि आइकाॅन नहीं है तो आप स्टार्ट बटन पर क्लिक करें और फिर प्रोग्राम मीनू पर जाकर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड को क्रियान्वित कर दें। ऐसा करने से वर्ड कंप्यूटर में लोड जो जाएगा। यहां से आप उसमें कार्य करना प्रारंभ कर सकते हैं।
यहां पर आप यदि दस्तावेज बनाने का कार्य प्रारंभ करना चाहते हैं तो फाइल मीनू में दिए हुए न्यू कमांड पर क्लिक करें। न्यू कमांड पर क्लिक करते ही यह कमांड सक्रिय होगा और स्क्रीन पर इसका एक आॅप्शन डायलिंग बाॅक्स जिसमें कि कई विकल्प और टैब आॅप्शन होते हैं आपके सामने आएगा। इसमें आप देखेंगे कि डिफाॅल्ट सेटिंग के रूप में सबसे पहले जनरल नाम टैब आॅप्शन आपके सामने है और इस टैब आॅप्शन में दो आइकाॅन हैं। खाली फाइल खोलने के लिए आप इसमें दिए हुए ब्लैंक डाॅक्यूमेंट आइकाॅन पर दो बार क्लिक कर दें। क्लिक करते ही स्क्रीन पर खाली फाइल खुलकर आ जाएगी। जहां से आप टाइपिंग का कार्य प्रारंभ कर सकते हैं-
विजार्ड से डाॅक्यूमेंट बनाना
वर्ड के नए संस्करण में डाॅक्यूमेंट के निर्माण के लिए कई विजार्डों को जोड़ा गया है। जिनका प्रयोग करके आप बहुत ही आसानी से तरह-तरह के दस्तावेज बना सकते हैं। इस कार्य के लिए आपको फाइल मीनू में दिए हुए न्यू कमांड पर क्लिक करना होगा। जैसे ही आप क्लिक करेंगे आपके सामने न्यू कमांड का एक आॅप्शन मीनू आ जाएगा। इस मीनू में आप उस टैब पर क्लिक करें, जिस तरह के दस्तावेज आप बनाना चाहते हैं। ऐसा करते ही आपके सामने विजार्डों की सूची दिए हुए चित्र की भांति आ जाएगी-
आप जिस प्रकार का दस्तावेज बनाना चाहते हैं उससे संबंधित विजार्ड पर क्लिक करें। विजार्ड का प्रिव्यू आपको प्रिव्यू विंडो में दिखाई देगा। इसके साथ ही साथ स्क्रीन पर आपके सामने लगातर निर्देश आएंगे। इन निर्देशों का पालन करते हुए आप दस्तावेज का निर्माण कर सकते हैं।
टेम्प्लेट्स से दस्तावेज बनाना
विजार्ड के अतिरिक्त आप टेम्प्लेट का भी प्रयोग करके आप दस्तावेज का निर्माण कर सकते हैं। इस कार्य के लिए भी आपको फाइल मीनू में दिए हुए न्यू कमांड पर क्लिक करना पड़ेगा और फिर आप जिस तरह का डाॅक्यूमेंट बनाना चाहते हैं उससे संबंधित टैब पर क्लिक करें और टैब खुलने पर जब आपके सामने टेम्पलेट की सूची जा जाए तो आप संबंधित आइकाॅन पर दो बार क्लिक कर दें।
डाॅक्यूमेंट को टेम्पलेट बनाना
वर्ड प्रोसेसिंग के तहत आप वर्ड पर आधारित टेम्प्लेट बना सकते हैं तो इसके साथ ही साथ अपने द्वारा बनाए हुए डाॅक्यूमेंट पर आधारित नए टेम्प्लेट भी बना सकते हैं। इस कार्य के लिए आप जिस डाॅक्यूमेंट को प्रयोग कर रहे हैं उसे टेम्प्लेट का रूप देने हेतु फाइल मीनू में ओपन कमांड पर क्लिक करें। और जब दस्तावेज आपके सामने आ जाए तो उसके आइकाॅन पर क्लिक करके खोल लें। इसके पश्चात आप न्यू कमांड पर क्लिक करें और आप जैसा टेम्पलेट बनाना चाहते हैं उससे मिलते-जुलते टेम्प्लेट को क्लिक कर दें। क्रिएट न्यू के अंतर्गत टेम्प्लेट्स नामक बटन पर क्लिक करें। फिर ओके बटन पर क्लिक कर दें। जब यह कार्य हो जाए तो फाइल मीनू में सेव ऐज़ कमांड पर क्लिक करें। ऐसा करते ही आपके सामने निम्न आॅप्शन आएगी-
इस विंडो में आप टाइम्स बाॅक्स में जाकर सेव करने की क्रिया के लिए डाक्यूमेंट टेम्प्लेट्स विकल्प चुनें और फिर सेव बटन पर क्लिक कर दें।
डाॅक्यूमेंट की प्रति खोलना
यदि हमने वर्ड प्रोसेसिंग में एक दस्तावेज का निर्माण किया है और हम उसे उसके वास्तविक रूप में न खोलकर उसकी काॅपी खोलना चाहते हैं तो ऐसा भी कर सकते हैं। इस कार्य के लिए आपको फाइल मीनू में ही दिए हुए ओपन कमांड पर क्लिक करना पड़ेगा। ऐसा करते ही हमारे सामने ओपन कमांड एक आॅप्शन मीनू आएगा-
यहां पर आप जिस दस्तावेज को खोलना चाहते हैं उस पर क्लिक करें और फिर उसे एक प्रति के रूप में खोलने के लिए ओपन बटन के पास बने एरो पर क्लिक कर दें। यहां पर आपको ओपन ऐज़ काॅपी विकल्प मिलेगा। जिस पर क्लिक करते ही दस्तावेज़ की मूल प्रति अपनी जगह रहेगी, आपके सामने उसकी एक डुप्लीकेट काॅपी खुलकर आ जाएगी। जिसमें आप मनचाहा परिवर्तन कर सकते हैं।
नेटवर्क पर दस्तावेज खोलना
यदि आप नेटवर्क से जुड़े किसी दूसरे कंप्यूटर में स्टोर दस्तावेज या फाइलों को खोलना चाहते हैं तो आप उसके लिए फाइल मीनू के ओपन कमांड पर क्लिक करके नेटवर्क फोल्डरों को खोलें और उसमें दिए हुए डाॅक्यूमेंट पर दो बार क्लिक करें। ऐसा करने से यह डाॅक्यूमेंट खुलकर आपके सामने आ जाएगा। यहाँ से उस फाइल को स्लेक्ट करें जिसे खोलना है और फिर ओपन बटन पर क्लिक करें।
पुराने संस्करणों की फाइलों को खोलना
फाइल मीनू में आप इस कार्य के लिए वर्जन कमांड पर क्लिक करें और जब इसका आॅप्शन मीनू आपके सामने आ जाए तो उसमें जाकर उस संस्करण को स्लेक्ट करें जिसकी फाइल आप खोलना चाहते हैं और जब यह वर्जन सेट हो जाए फिर आप ओपन कमांड पर क्लिक करके इस संस्करण से संबंधित दस्तावेजों को खोल सकते हैं।
मेमो बनाना
वर्ड प्रोसेसिंग करते हुए हमें कई बार मेमो बनानी पड़ सकती है। मेमो बनाने के लिए आपको फाइल मीनू के न्यू कमांड पर क्लिक करना पडे़गा। ऐसा करते ही आपके सामने न्यू कमांड का आॅप्शन मीनू आ जाएगा। इस मीनू में आप मेमो टैब को क्लिक करें। क्लिक करते ही मेमो टैब के अंतर्गत आने वाले तमाम आइकाॅन स्क्रीन पर दिखाई देने लगेंगे-
यहां पर आपके केवल विजार्ड में लिखे हुए निर्देशों का पालन करना है। निर्देशों का पालन करके आप मेमो विजार्ड का निर्माण कर सकेंगे।
पैफक्स बनाना और भेजना
मेमो की तरह से ही आप वर्ड प्रोसेसिंग करते हुए माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में फैक्स विजार्ड का प्रयोग करके फैक्स बना सकते हैं और उसे उस स्थान पर भेज सकते हैं जहां उसकी जरूरत है। इस कार्य को करने के लिए आपको फाइल मीनू के न्यू कमांड का प्रयोग करना होगा। जैसे ही फाइल मीनू का न्यू कमांड क्रियान्वित होगा आपके सामने इसका एक आॅप्शन डायलाॅग बाॅक्स आएगा। इसमें आपको लेटर और फैक्स नामक टैब दिखाई देगा। यहां पर आप लेटर और फैक्स नामक भाग पर क्लिक कर दें। क्लिक करते ही इससे
संबंधित आइकाॅन स्क्रीन पर दिखाई देंगे। यहां पर आप फैक्स विजार्ड पर क्लिक करें। क्लिक करते ही फैक्स विजार्ड सक्रिय होगा और स्क्रीन पर इस प्रकार आएगा-
यहां पर आप नेक्स्ट बटन पर क्लिक करते जाएं और स्क्रीन पर दिखाई दे रहे निर्देशों का पालन करें। ऐसा करते हुए आप फैक्स का निर्माण कर सकेंगे और उसे गंतव्य स्थान पर भेज भी सकेंगे।
कलेंडर बनाना
फैक्स की तरह ही वर्ड में कलेंडर का निर्माण किया जाता है। इस कार्य के लिए फाइल मीनू के न्यू कमांड पर क्लिक करें और जब आपके सामने इसका आॅप्शन मीनू आ जाए तो उसमें दिए हुए अदर डाॅक्यूमेंट्स नामक टैब आॅप्शन्स को खोलें। इसमें आप देखेंगे कि एक कलेंडर विजार्ड के नाम से आइकाॅन है। इस आइकाॅन को माउस से क्लिक करें। जब यह स्लेक्ट होगा तो प्रिव्यू विंडो में आपको इसका प्रिव्यू दिखाई देगा। जहां से आप इस बात को सुनिश्चित कर सकते हैं कि यह कलेंडर विजार्ड ही है। इसके बाद आप इस विजार्ड पर दो बार क्लिक करें। आपके सामने इस विजार्ड का पहला स्टेप आएगा।
इस स्टेप में आपको केवल नेक्स्ट बटन पर क्लिक करना है। नेक्स्ट बटन पर क्लिक करने से आपके सामने इसका दूसरा चरण आएगा। यदि आप इसमें लिखे हुए निर्देशों का पालन करते जाएंगे तो बहुत ही शीघ्रता के साथ कलेंडर का निर्माण कर सकेंगे।
एजेंडा बनाना
कलेंडर की तरह से ही आप एजेंडा भी बना सकते हैं। क्योंकि एजेंडा बनाने के लिए जिस विजार्ड का प्रयोग होता है वह भी फाइल मीनू के न्यू कमांड के अंतर्गत आने वाले आॅप्शन मीनू में दिए हुए अदर डाॅक्यूमेंट टैब के अंगर्तत होता है। इसकार्य के लिए आप इसमें एजेंडा विजार्ड क्लिक करें। एजेंडा विजार्ड का पहला स्टेप दिखाई देगा। इस स्टेप में आपको नेक्स्ट बटन पर क्लिक करना है और ऐसा करते हुए आप फराने दस्तावेजों की तरह से किसी भी एजेंडा का निर्माण कर सकेंगे।
डाॅक्यूमेंट सेव करना
वर्ड मे सरलता के साथ मनचाहे फाॅर्मेट में फाइल सेव कर सकते हैं। इसके लिए आपको स्टैंडर्ड टूल बार में दिए सेव आइकाॅन पर क्लिक करना होगा या फिर फाइल मीनू में दिए हुए सेव कमांड पर। यदि आप की-बोर्ड के साथ कंट्रोल की के साथ एस की को दबाएंगे तो भी आपके सामने सेव करने के लिए एक आॅप्शन विंडो आएगी। इस आॅप्शन विंडो में जाकर आप सबसे पहले सेव इन नामक विकल्प का प्रयोग करके इस फोल्डर को चुनें जहां आप इस दस्तावेज को सेव करना चाहते हैं। इसके बाद आप फाइल नेम नामक विकल्प में आ जाएं और वहां पर फाइल का मनचाहा नाम टाइप करें। यदि फाइल को वर्ड के अलावा किसी दूसरे सॉफ्टवेयर या दूसरे फाॅर्मेट में सेव करना है तो आप सेव ऐज़ टाइप विकल्प विंडो से इस फाॅर्मेट का चुनाव कर सकते हैं। इस विंडो में जो विकल्प दिए हुए हैं यदि आपके द्वारा किया जाने वाला फाॅर्मेट इन विकल्पों में है। तो आप उस पर माउस से क्लिक करके स्लेक्ट करें और फिर सेव बटन पर क्लिक कर दें। ऐसा करने से आपके द्वारा चुने हुए फोल्डर में आपके द्वारा रखे गए नाम से और आपके द्वारा निर्धारित किए गए फाॅर्मेट के अनुसार फाइल या दस्तावेज सेव जो जाएगा। सेव करने के पश्चात यदि आप दस्तावेज को बंद करना चाहते हैं तो फाइल मीनू में दिए हुए क्लोज़ कमांड पर क्लिक करके वर्ड को बिना बंद किए हुए इस फाइल को बंद कर सकते हैं।
डाॅक्यूमेंट में डेट और टाइम जोड़ना
किसी डाॅक्यूमेंट मे तारीख लिखने के लिए आपको वर्ड के इंसर्ट मीनू को खोलना होगा और उसमें दिए हुए डेट एंड टाइम का प्रयोग करना होगा। इस कमांड पर क्लिक करते ही आपके सामने डेड एंड टाइम कमांड का विकल्प मीनू खुलेगा और इसमें आपको एवलेबल फाॅर्मेट नामक विंडो दिखाई देगीेे। एवलेबल नामक फार्मेट विंडो को आप ध्यान से देखिए इसमें आपको समय और तारीखों के अनेक फाॅर्मेट आपको दिखाई देंगे। आप अपने देश में प्रचलित फार्मेट के अनुसार जिसे भी प्रयोग करना चाहें उसे क्लिक कर दें। क्लिक करते ही वह स्लेक्ट हो जाएगा और फिर आप ओके बटन पर क्लिक कर दें। यहां पर आपको एक और सुविधा मिलेगी जिसके द्वारा आप इस समय और तारीख को आॅटोमेटिक तरीके से अपडेट करने का विलल्प भी प्रयोग कर सकेंगे।
डेट और टाइम के मुख्य आॅप्शन मीनू में अपडेट आॅटोमेटिकली नामक एक चैक होता है। जिसके ऊपर आप माउस से क्लिक करेंगे तो यहां पर एक क्राॅस का निशान बन जाएगा। इसका अर्थ यह है कि विकल्प सक्रिय कर लिया है और अब आपके दस्तावेज में प्रयोग की गई समय और तारीख अपडेट होती रहेगी। इसके अतिरिक्त यदि आप समय और तारीख के लिए किसी दूसरी भाषा का प्रयोग करना चाहते हैं तो इसमें दिए हुए लैंग्वेज़ नामक आॅप्शन का प्रयोग करके मनचाही भाषा का चुनाव कर सकते हैं। यहां पर दिए हुए लैंग्वेज़ बाॅक्स में जो भाषाएं शामिल होती हैं वह वर्ड के अंतर्गत एडिट भी हो सकती हैं और इसलिए आप उनका यहां पर इस्तेमाल कर सकते हैं।
करेंट तारीख को खुद ही जोड़ना
यदि आप यह चाहते हैं कि आपके दस्तावेज़ में आज जो तारीख है वर्ड उसे स्वयं जोड़ दे तो अब आप इसकी सेटिंग भी कर सकते हैं। यह कार्य करने के लिए आप सबसे पहले आॅटो कम्प्लीट नामक आॅप्शन को सक्रिय करें और तारीख के पहले चार अक्षर टाइप कर दें। ऐसा करते ही माइक्रोसॉफ्ट वर्ड माॅनीटर पर एक आपको टिप दर्शाएगा। जिसमें आपको वर्तमान समय में चल रहा महीना दिखाई देगा। यहां पर आप उसे स्लेक्ट कर सकते हैं और इसके बाद आप जैसे ही स्पेस टाइप करेंगे आपके सामने करेंट डेट भी आ जाएगी। जिस पर क्लिक करके एंटर की को दबाते ही इसे आप दस्तावेज में जोड़ सकते हैं।

क्लिक और टाइप सुविधा प्रयोग करना
क्लिक करके दस्तावेज में इस तरह की सुविधाओं को जोड़ना वर्ड प्रोसेसिंग में क्लिक एंड टाइप नामक एक शब्द के द्वारा जाना जाता है।
डाॅक्यूमेंट की खाली जगह में जब आप टेक्स्ट या ग्राफिक, टेबल या फिर किसी दूसरी आइटम को तेजी से शामिल करना चाहें तो इसके लिए आप वर्ड प्रोसेसिंग में आने वाली क्लिक और टाइप सुविधा का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस कार्य के संदर्भ में आप खाली जगह पर दो बार क्लिक करें। ऐसा करने से क्लिक और टाइप स्वयं ही आइटम को खाली जगह में भरने के लिए एक जरूरी पोजी़शन आपके सामने लेकर आएगा।
क्लिक और टाइप सुविधा आपको मल्टीपल काॅलम और बुलैट और नंबरों वाली लिस्ट, टेक्स्ट से घिरे हुए फोटो इत्यादि के संदर्भ में उपलब्ध होती है। जबकि सामान्य व्यू, आउट व्यू और प्रिंट व्यू में यह सुविधा उपलब्ध नहीं होती है। लेकिन इसके पहले आपको यह बात भी सुनिश्चित करनी होगी क्या आपने कंप्यूटर में इस आॅप्शन को सक्रिय किया है या नहीं। इसे सुनिश्चित करने के लिए आप टूल्स मीनू में जाएं और उसमें दिए हुए आॅप्शन कमांड पर क्लिक कर दें। इसके बाद आप इसके एडिट टैब को खोलें। क्लिक करते ही यह खुल जाएगा और इसके अंतर्गत आने वाले विकल्प आप देख सकते हैंै। इन विकल्पों में आपको क्लिक एंड टाइप नामक भाग में एनैबल क्लिक एंड टाइप नामक एक चैक बाॅक्स मिलेगा। जिस पर माउस से क्लिक करते ही वहां पर एक सही का निशान बन जाएगा। इस निशान का अर्थ यह है कि यह सुविधा सक्रिया हो गई है इसके पश्चात आप ओके बटन पर क्लिक कर दें। अब आप प्रिंट लेआउट व्यू या वेब लेआउट व्यू को क्लिक करें। फिर दस्तावेज में उस जगह जहां पर टेक्स्ट ग्राफिक टेबल जोड़ना चाहते हैं। माउस प्वाइंटर को ले जाएं तथा क्लिक कर दें। प्वाइंटर का आकार आपको यह बताएगा कि आइटम किस तरह से फाॅर्मेट होगा। उदाहरण के लिए यदि आप पेज के बीचों-बीच में प्वाइंट करते हैं तो प्वाइंट का आकार बताता है कि आइटम बीच में होगा। दो बार क्लिक करें फिर हमेशा की तरह से टेक्स्ट टाइप करना शुरू करें। इससे आप किसी भी आइटम को दस्तावेज में शामिल कर सकते हैं। यदि आपने गलती से दो बार क्लिक कर दिया है और आपको इस सुविधा का प्रयोग नहीं करना है तो दस्तावेज में किसी दूसरे स्थान पर जाकर दो बार क्लिक कर दें।
किसी दूसरे पेज या आइटम पर जाना
यदि आपके द्वारा बनाई हुई फाइल में सैकड़ों की संख्या में पेज हैं तो आप उनमें से किसी भी पेज पर बहुत ही शीघ्रता के साथ पहंुच सकते हैं। इस संदर्भ में आपको एडिट मीनू में दिए हुए गो-टू कमांड का इस्तेमाल करना होगा। जब आप गो-टू कमांड पर माउस से क्लिक करेंगे तो इसका आॅप्शन मीनू स्क्रीन पर दिखाई देगा।
यहां पर आप दिए हुए विकल्पों को सेट करके मनचाहे पेज और पेज में मनचाहे स्थान पर पहंुच सकते हैं।

इंटरनेट (Internet)

वर्ल्ड वाइड वेब


बिना टीसीपी/आईपी के इंटरनेट पर कंप्यूटरों के बीच डेटा का आदान-प्रदान असंभव होता है। वर्ल्ड वाइड वेब अब इंटरनेट का एक व्यावसायिक हिस्सा बन चुका है। वेब की खूबी यह है कि इस पर आप ग्राफिक्स और टैक्स्ट सभी कुछ पा सकते हैं। वेब रूट पते को इंटरनेट पर भेज देते हैं। और सही सर्वर तक पहुंचाते हैं, जब पेज और ग्राफिक्स व टेक्स्ट को इंटरनेट के सहारे उस कंप्यूटर तक भेज देता है, जिसने इसके लिए वेब पता भेजा था । फिर वेब ब्राउज़र इन सभी को प्राप्त करके सही क्रम में लगा देता है और स्क्रीन पर प्रदर्शित कर देता है। जब वेब ब्राउज़र आपकी मांग को पूरा कर देता है, तब वह दूसरे कंप्यूटर से आए संदेश के लिए काम करता है। यदि आप उसी वेब सर्वर से दूसरा पेज लोड करने का अनुरोध करेंगे, तो यह सारी प्रक्रिया नए सिरे से होगी ।

इंटरनेट सूचना

इंटरनेट पर उपलब्ध डेटा की तादाद की कल्पना कर पाना असंभव है। इंटरनेट पर डेटा मुख्य रूप से व्यावसायिक संस्थान, कंपनियां सरकारें और शिक्षण संस्थान उपलब्ध कराते हैं। कंपनियों और व्यावसायिक संस्थानों के लिए वेब पैसा कमाने का एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराती है। वेब के जरिए ये कंपनियां दुनियाभर में अपना बाजार तालाश कर उत्पाद बेचती हैं। अब तो तमाम कंपनियों व बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों तक ने वेब पर अपना पूरा ब्यौरा डाल रखा है।
इस प्रकार कारोबारी दुनिया से संबंधित समस्त डेटा आपको वेब पर मिल जाएगा। इसी तरह संघीय, राज्य सरकारों व स्थानीय प्रशासन की अपनी वेबसाइट होती हैं। वेब के जरिए तो अब टैक्स अदा करने की भी सुविधा है। शिक्षा संस्थानों ने भी इंटरनेट पर काफी सारे डेटा डाले हैं। बुनियादी जानकारी ले लेकर दुनियाभर में हर क्षेत्र में हर विषय में चल रहे शोध, हो चुके शोध आदि सबकी जानकारी इंटरनेट पर मिलेगी।

इंटरनेट का संचालन

आधुनिक उपकरणों की मदद से इंटरनेट का संचालन काफी आसान काम है। इंटरनेट से जुड़ने के कई तरीके हैं आइये इन तरीकों पर एक नज़र डालते हैं-
माॅडेम: इंटरनेट तक पहुुंच के लिए सबसे आसान रास्ता टेलीफोन लाइन है। माॅडेम हार्डवेयर का वह हिस्सा होता है, जो कंप्यूटर डेटा को सिग्नलों में परिवर्तित कर देता है और ये सिग्नल टेलीफोन लाइन से चले जाते हैं। माॅडेम आपके इंटरनेट सेवा प्रदाता के माॅडेम को डायल करता है और उससे कनेक्शन जुड़ जाता है। फिर इंटरनेट सेवा प्रदाता का कंप्यूटर आपको इंटरनेट से जोड़ देता है और आपके डेटा को इंटरनेट पर उचित सर्वर के पास भेज देता है।
लोकल एरिया नेटवर्क: कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को कंपनी के लोकल एरिया नेटवर्क के जरिए इंटरनेट से जुड़ने की सुविधा देती हैं। बड़ी कंपनियों के पास तो प्रायः अपने ही इंटरनेट सर्वर होते हैं, जो नेटवर्क के साथ जुड़कर सभी सक्रिय इंटरनेट कनेक्शनों को उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में जब आप नेटवर्क से जुड़े होते हैं और आपके पास सही सॉफ्टवेयर है, तो आप लोकल एरिया नेटवर्क के जरिए इंटरनेट से आसानी से जुड़ सकते हैं।

इंटरनेट के डोमेन

टीएलडी: ये टाॅप लेवल डोमेन हैं जो यूआरएल के अंत में प्रत्यय के रूप में लगते हैं। उदाहरण के लिए, www.edudose.com में .com टीएलडी है। इस समय .com के अलावा जो टीएलडी उपलब्ध हैं, उनमें .net, .org, .gov, .edu और .mil हैं।
जीटीएलडी: जेनेरिक टाॅप लेवल डोमेनों का पूर्व जातीय नाम होता है। जैसे www.books.com, www.music.com कोई भी इन्हें फौरन किसी कंपनी या व्यक्ति से नहीं जोड़ सकता। लेकिन सामान्य रूप में ये एक वर्ग को प्रदर्शित करते हैं।
सीटीएलडी: कंट्री टाॅप लेवल डोमेन। ये डोमेन नाम विशिष्ट देशों को ही दिए जाते हैं। उस देश में जो संबंधित नियामक संस्था होती है, वही इन पर नियंत्रण रखती है। उदाहरण के लिए, भारत के लिए in, फ्रांस के लिए .fr कनाडा के लिए .cd ब्राजील के लिए .br आदि।

सर्च इंजन

इंटरनेट सूचनाओं का भंडार है। दुनिया का शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा, जिसके बारे में इंटरनेट पर जानकारी नहीं उपलब्ध है। चिकित्सा से लेकर शिक्षा इंजीनियरिंग से लेकर सामयिकी तक हर विषय के लिए ढेरांे सूचनाएं वेब पर उपलब्ध हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों की पहंुच इन सूचनाओं तक नहीं हो पाती है। इंटरनेट सर्पिंफग करने वाले लोगों को भी इसकी जानकारी नहीं है कि इन सूचनाओं तक आसानी से कैसे पहुंचा जा सकता है। इसलिए ज्यातातर नेट सर्पफर कुछ खास साइटों तक ही सीमित होते हैं और अपनी जरूरत की सूचनाओं के लिए इन्हीं पर आश्रित होते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अगर नेट सर्पिंफग के लिए मौजूद समाधानों का तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो बहुत आसानी से दुनिया भर की सूचनाएं बहुत कम समय में हासिल की जा सकती हैं। नेट सर्पिंफग को आसान बनाने और अपनी जरूरत की सूचनाओं को आसानी से हासिल करने के लिए सबसे उपयोगी समाधान है सर्च इंजन। भारत में चूंकि यह बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ है, इसलिए भारत केन्द्रित सर्च इंजनों की कमी है, लेकिन दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण सर्च इंजनों जैसे-याहू, एमएसएन, गूगल्स आदि पर भारत के बारे में भी ढेरों सूचनाएं दर्ज हैं। अगर इन सर्च इंजनों का इस्तेमाल समझ के साथ किया जाए तो कम समय में ज्यादा सूचनाएं हासिल की जा ती हैं।
जैसे-जैसे सर्च इंजनों की लोकप्रियता बढ़ रही है, वेब कंपनियां खुद को सर्च इंजनों पर दर्ज करने की कोशिशें तेज कर रही हैं। ज्यादातर वेब कंपनियां, वेबसाइट, कंटेंट तैयार करने वाली कंपनियां, नेट अखबार, नेट पत्रिकाएं आदि अपनी ज्यादा-से-ज्यादा सूचनाओं को लोगों तक पहंुचाने के लिए सर्च इंजन पर खुद को दर्ज करा रही हैं। इनका लाभ यह होता है कि सर्च इंजन के जरिए जरूरी सामग्री की खोज कर रहा उपयोक्ता उनकी साइट पर पहंुचता है। जिससे उनके उपयोक्ताओं की संख्या में इजाफा होता है। ज्यादा-से-ज्यादा उपयोक्ताओं को अपनी ओर खींचने के लिए वेबसाइट अपनी सूचनाओं को सर्च इंजन पर ऐसे दर्ज कर रही हैं, जिससे उपयोक्ता आसानी से वहां तक पहंुच सके। इसका सीधा मतलब यह है कि उपयोक्ता को अपनी जरूरत की सूचना तलाश करने के लिए किसी तकनीकी जटिलता में नहीं पड़ना है, बल्कि उसको सीधे अपनी जरूरत की चीज का नाम दर्ज करना है। अगर उपयोक्ता को किसी बहुत छोटी चीज की तलाश करनी है तो उसे उस छोटी चीज का नाम भी सर्च इंजन में डालने से नहीं हिचकना चाहिए। लेकिन इससे भी पहले उपयोक्ता को अपनी जरूरत के सर्च इंजन में डालने से नहीं हिचकना चाहिए। लेकिन इससे भी पहले उपयोक्ता को अपनी जरूरत के सर्च इंजन की भी पहचान होनी चाहिए। अपनी सूचना तलाश करने से पहले सबसे जरूरी सर्च इंजन की पहचान है। इंटरनेट पर सूचनाओं की तलाश को आसान बनाने के लिए मूल रूप से तीन किस्म के समाधान हैं- इनमें पहला है सर्च इंजन, दूसरा है सब्जेक्ट डायरेक्टरी और तीसरा है मेटा सर्च इंजन।

सब्जेक्ट डायरेक्टरी

जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, यहां खास विषयों की साइटों के लिए अलग-अलग समूह होते हैं। उपयोक्ता को जिस विषय से जुड़ी सामग्री चाहिए होती है, उसकी तलाश के जवाब में उसी विषय से जुड़ी साइटों के पते उसे मिलते हैं। इनकी संख्या सर्च इंजनों के मुकाबले कम है क्योंकि यहां छोटी-छोटी चीजों को आसानी से नहीं खोजा जा सकता है। लेकिन इसका लाभ यह है कि उपयोक्ता को अपनी जरूरत की चीज के लिए बहुत भटकना नहीं पड़ता है। अगर किसी व्यक्ति को जीव-विज्ञान के बारे में जानकारी लेनी है तो वह सिर्फ बायोलाॅजी लिख कर ही अपनी जरूरत की साइटों तक पहंुच सकता है। वहां जाकर वह अपनी जरूरत की खास चीजों की तलाश कर सकता है। इसलिए अगर आपको विषय के बारे में बहुत जानकारी नहीं है, तो इसका इस्तेमाल ज्यादा लाभदायक होता है।

ई-मेल (E-mail)


इंटरनेट द्वारा पत्र भेजना और पत्रों को प्राप्त करना ई-मेल कहलाता है। इन पत्रों के माध्यम से अप टेक्सट के साथ फोटोग्राफ तथा अपनी आवाज़ तक भेज सकते हैं। आजकल यह बिना पैसे खर्च किये कम्युनीकेशन का सबसे तेज तरीका है। आप दो तरह की ई-मेल को इंटरनेट पर अपने काम में प्रयोग कर सकते हैं।
पहले प्रकार में वेब पर आधारित वह ई-मेल सेवायें आती हैं जो बिलकुल मुफ्त होती हैं और जिनका प्रयोग आप वह वेब साइट खोलकर कर सकते हैं जिस पर यह सुविधा उपलब्ध है। जैसे कि- gmail.com, hotmail.com, yahoo.com, rediff.com etc.

ई-मेल खाते की स्थापना

उदाहरण के लिए यदि आपको हाटमेल पर ई-मेल खाता खोलना है तो आपको सबसे पहले ब्राउज़ के एड्रसबार में www.hotmail.com लिखना होगा। इसे लिखने से पहले अप इंटरनेट से जुड़ जायें। जब आप यह पता टाइप कर देंगे तो आपके सामने हाॅटमेल की वेब साइट खुलकर आ जायेगीे। इस साइट में अपको नया ई-मेल खाता खोलने के लिए न्यू यूज़र नामक आॅप्शन पर क्लिक करना है। इससे आपके सामने एक फार्म आयेगा। इस फार्म में आपको पूछे गये प्रत्येक सवाल का जवाब लिखना है। कुछ जवाब तो अनिवार्य होते हैं और कुछ अनिवार्य नहीं होते हैं। जो अनिवार्य होंगे उनके ऊपर एक लाल रंग का स्टार या कोई निशान बना रहता है। इनको भरकर आप जब फार्म के द्वारा सभी सूचनाओं को हाॅटमेल में दाखिल करेंगे तो आपके सामने कुछ ई-मेल पते आयेंगे कि आप इनमें से अपने लिये किसी को चुन लें। ऐसा उस अवस्था में होता है जब आप द्वारा मांगा गया पता उपलब्ध नहीं होता है। क्योंकि फार्म भरते समय आपको ई-मेल पता और लाॅगिन तथा पासवर्ड भी टाइप करना पड़ता है। यदि वह पता उपलब्ध है जिसे आपने मांगा है तो आपका ई-मेल खाता खुल जायेगा अन्यथा जो वैकल्पिक पते आपके सामने आये हैं उनमें से आप किसी को चुन सकते हैं या फिर नया पता टाइप कर सकते हैं। आपके द्वारा लिखा नया पता यदि किसी का नहीं है तो आपका खाता खुल जायेगा।

ई-मेल खाते का प्रयोग

ई-मेल खाते को आप दुनिया भर में किसी भी कंप्यूटर से खोलकर प्रयोग कर सकते हैं। प्रयोग करने के लिए भी आपको हाॅटमेल वेबसाइट खोलनी होगी और इस बार लाॅगिन नेम वाले आॅप्शन में अपना लाॅगिन नेम और पासवर्ड वाले आॅप्शन में अपना पासवर्ड डालना होगा। इससे आपके सामने ई-मेल चैक करने और कम्पोज़ करने का या आॅप्शन आयेगा-
यहां से आप कम्पोज़ या राइट विकल्प का प्रयोग करके ई-मेल टाइप करें और फिर सेंड बटन पर क्लिक करके उसे भेज सकते हैं। लेकिन इसके लिए जव आॅप्शन में उस व्यक्ति का पता टाइप होना चाहिए जिसे मेल भेजनी है। इसी तरह से जो मेल आपके पास आयेंगी उन्हें आप इनबाॅक्स (Inbox) आॅप्शन में जाकर खोलकर देख सकते हैं।

आउटलुक से ई-मेल प्रयोग करना

विंडोज़ में दिया गया यह यूटीलिटी सॉफ्टवेयर ई-मेल सुविधा के सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है। इसे प्रयोग करने से पहले आपको इसमें अपने ई-मेल एकाउंट की स्थापना करनी होगी। आइये सीखते हैं कि आउटलुक में ई-मेल एकाउंट की स्थापना कैसे करते हैं-
  1. सबसे पहले विंडोज़ के प्रोग्राम मीनू में जाकर आउटलुक एक्सप्रेस नामक आइकाॅन पर क्लिक करें। इससे यह प्रोग्राम रन होगा और आपके सामने आ जायेगा।
  2. जब आपके सामने यह स्क्रीन आ जाये तो आप इसके टूल्स मीनू को खोलें और माउस को एकाउंट कमांड पर ले जायें।
  3. इसके बाद आप इस एकाउंट नामक कमांड पर क्लिक कर दें। ऐसा करते ही आपके सामने इसका आॅप्शन मीनू आ जायेगा।
  4. यहां पर आप राइट साइड में ऊपर की ओर दी गयी Add बटन पर क्लिक करें। इससे आपके सामने इसका एक मीनू आ जायेगा।
  5. इस मीनू में आपको तीन विकल्प दिखाई दे रहे हैं, इनमें सबसे पहले विकल्प का नाम मेल है। चूंकि आपको अपना मेल एकाउंट खोलना है इसलिए आप इस मेल विकल्प पर क्लिक करें।
  6. इस विकल्प विंडो में आप अपना नाम टाइप कर दें। आपके द्वारा टाइप इसी नाम से खाते का टाइटल बनेगा। नाम टाइप करने के बाद नेक्सट बटन पर क्लिक करें।
  7. इस मीनू में आप अपना वह ई-मेल पता टाइप करें जो आपको ISP से मिला है। यह पता आपको पहले विकल्प पर टाइप करना है। ई-मेल पता टाइप करने के बाद फिर से नेक्सट (Next) बटन पर क्लिक करें।
  8. इस मीनू में आपको सर्वर के बारे में जानकारी भरनी है। सर्वर के बारे में यह जानकारी इंटरनेट कनेक्शन खरीदने पर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से मिलती है।
  9. इनकमिंग और आउटगोइंग दोनों विकल्प विंडो में आप यह जानकारी भरकर फिर से नेक्सट बटन पर क्लिक करें।
  10. इस मीनू में आप इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा दिया लाॅगिन नेम और पासवर्ड टाइप करें। इसके बाद नेक्सट बटन पर क्लिक कर दें। आपके सामने अंतिम मीनू आयेगा। यहां पर फिनिश बटन पर क्लिक करें। इससे ई-मेल प्रयोग करने की सुविधा आउटलुक में उपलब्ध हो जायेगी। जहां पर आप इनबाॅक्स में मेल देख सकते हैं और आउटबाॅक्स में जाकर मेल भेज सकते हैं।

हाइपर टेक्स्ट और हाइपर मीडिया


संभवतः आपने देखा होगा कि कुछ फस्तकों में किसी अध्याय विशेष में किसी अन्य फस्तक के किसी अध्याय अथवा भाग विशेष का उल्लेख किया रहता है। ऐसे में हम उस किताब और उसके अध्याय का नाम किसी अन्य कागज पर लिख लेते हैं और फिर अवसर मिलते ही उस पाठ्य सामग्री का अध्ययन करते हैं। वेब पेज की स्थिति में इसका लेखक जब किसी अन्य पेज का संदर्भ देते समय पेज के नाम को उस पेज से ही क्लिक कर देता है। अर्थात अब इस संदर्भ पर माउस का प्वाइंटर लाकर क्लिक करने पर तुरंत उस पेज को देखा जा सकता है चाहे संदर्भ वाला यह पेज दुनिया के किसी भी हिस्से में स्थित किसी भी वेब सर्वर कंप्यूटर पर स्टोर क्यों न हो।
हाइपर टेक्स्ट से मिलता-जुलता शब्द है। हाइपर मीडिया। हाइपर टेक्स्ट से साफ जाहिर है कि यह सिर्फ टेक्स्ट से संबंधित है जबकि हाइपर मीडिया टेक्स्ट के अतिरिक्त अन्य तत्वों जैसे इमेज, आॅडियों और वीडियों आदि को भी सम्मिलित किया जाता है।

एचटीटीपी और एटीएमएल

हाइपर टेक्स्ट और हाइपर मीडिया के प्रयोग के लिए एक विशेष प्रोटोकाॅल की आवश्यकता होती है। इस प्रोटोेेकाॅल द्वारा ही हाइपर टेक्स्ट/हाइपर मीडिया की फाइलों को इंटरनेट पर एक स्थान से दूसरे स्थान पहंुचाया जाता है। इस प्रोटोकाॅल के कार्य करने के कुछ नियम हैं जिन्हें हाइपर टेक्स्ट/मीडिया भेजने वाले और प्राप्त करने वाले दोनों कंप्यूटरों द्वारा पालन करना अनिवार्य होता है। इन नियमों में एक नियम यह है कि इस प्रकार का हाइपर मीडिया भेजने वाले सिस्टम पर एचटीटीपी सर्वर और प्राप्त करने वाले सिस्टम पर एचटीटीपी क्लाइंट सॉफ्टवेयर होना ही चाहिए।
हाइपर टेक्स्ट और हाइपर मीडिया के विचार के प्रतिपादित होते ही एक ऐसी प्रोग्रामिंग भाषा की आवश्यकता थी जो इस विचार को वास्तविक रूप प्रदान कर सके। इसके लिए कंप्यूटर विशेषज्ञों ने हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज़ का विकास किया। एचटीएमएल, एसजीएलएल में से निकली एक लैंग्वेज़ है। स्टैंडर्ड जर्नलाइज्ड़ मार्कअप लैंग्वेज़ दुनिया भर में डाॅक्यूमेंटों के स्ट्रक्चर को तय करने का एक सिस्टम है। जिस प्रकार किसी भी वर्ड प्रोसेसिंग एप्लीकेशन में बनाए गए डाॅक्यूमेंट की फाॅर्मेंटिंग यूज़र अपनी आवश्यकतानुसार करते हैं उसी प्रकार एचटीएमएल का प्रयोग करते हुए वेब पेजों का निर्माण आवश्यकतानुसार किया जा सकता है।
एचटीएमएल, के अंतर्गत विभिन्न टैगों का प्रयोग करते हुए टाइटल, हैडिंग, बोल्ड, इटैलिक और पैराग्राफ पर लागू किए जाने वाले अन्य प्रभाव, पैराग्राफ, इमेज और उनका आकार, तथा अन्य डाॅक्यूमेंटों के हाइपर लिंक आदि सभी को उपयोग में लेते हुए वेब पेज का निर्माण किया जाता है। एचटीएमएल में बने डाॅक्यूमेंट को देखने के लिए ब्राउज़र नामक एक विशेष क्लाइंट सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है।

कंप्यूटर वायरस (Computer Virus)

वायरस प्रजातियों का मूल


वायरसों के बारे में जागरूकता पिछले 10 सालों में ही ज्यादा आई है। यंू तो 1960 के आसपास में ही इनकी मौजूदगी मानी जाती है। पहले के जो वायरस वर्जन थे, वे शोध सुविधाओं में सिर्फ टेस्ट प्रोग्राम के रूप में ही थे। लेकिन 1980 के उत्तरार्ध में मुख्यरूप से विश्वविद्यालयों के कंप्यूटर और शोध केंद्रो में ही यह समस्या आई। तब ये वायरस बहुत धीरी-धीरे स्नीकर-नेट से होते हुए संक्रमित फ्लॉपी से घुस जाते थे। पर 1990 के मध्य में वायरस लेखन में दो बड़े क्रांतिकारी बदलाव आए।
जैसे दुनिया में जैविक वायरस सबसे ज्यादा हवाई जहाजों व अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन बढ़ने से फैले, वैसे ही इंटरनेट और ई-मेल कंप्यूटर वायरसों को फैलाने वाला सबसे तेज माध्यम रहा। और इंटरनेट के जरिए फैले इन वायरसों ने दुनिया की लाखों मशीनों को संक्रमित कर डाला। सन् 1995 में माइक्रोसॉफ्ट ने मैक्रो कमांड लिखने के लिए एक टेक्स्ट आधारित प्रोग्रामिंग भाषा वर्ड बेसिक पेश की, जिससे कि वायरस लिखना काफी आसान हो गया।
पहला मैक्रो वायरस 1995 में सामने आया। 1998 तक इनकी तादाद बढ़कर एक हजार से ज्यादा पहंुच गई। लेकिन तब वायरस फैलने की गति इतनी बढ़ गयी थी कि संक्रमित फ्लॉपी डिस्क या संक्रमित ई-मेल अटैचमेंट से ही ये फैलते थे। यदि कोई उपयोक्ता, किसी दूसरे को डिस्क या अटैचमेंट नहीं देता, तो वायरस नहीं फैलता। हालांकि 1998 में मैलिसा वायरस आया और फिर उपयोक्ता के लिए इन सबका कोई मतलब नहीं रह गया था।

मैलिसा का योगदान

मैलिसा ई-मेल अटैचमेंट के रूप में आया। जैसे ही प्राप्तकर्ता अटैचमेंट पर क्लिक करता, वायरस आउटलुक के जरिए खुद प्राप्तकर्ता की एड्रेस बुकी पहली 50 प्रविष्टियों तक पहंुच जाता। यह वायरस एक शुक्रवार को फैलना शुरू हुआ और अगले सोमवार तक ढाई लाख कंप्यूटरों तक पहुंच गया। इससे तमाम कंपनियों के मेल सिस्टम बैठ गए और संघीय सरकार ने जांच शुरू की। एक कंपनी को दो घंटे भर के भीतर वायरस की 32 हजार काॅपियां मिली।
एक साल बाद जो लवलेटर वायरस आया, वह उपयोक्ता को आउटलुक बुक में दर्ज हरेक पते को खुद ई-मेल हो जाता था। प्रबंधकर्ताओं ने संक्रमित ई-मेल सिस्टमों को तेजी से बंद किया। इन लोगों ने हरेक उपयोक्ता के आउट बाक्स में जाम करने वाले वायरस की 600 प्रतियां पाई। हालांकि मैलिसा और लवलेटर वायरस बहुत तेजी से फैलने वाले थे और साफ-साफ मुसीबत में डालने वाले भी। न तो ये उपयोक्ता की हार्ड ड्राइवों को नष्ट करते थे, न ही सिस्टम को निष्क्रिय करते थे। साइमनरैक के राॅन माॅटिज़ कहते हैं कि जो सुपरवायरस होगा, उसमें इतनी जबर्दस्त क्षमता होगी कि बहुत कम समय में ही भारी नुकसान कर देगा।

अगली पीढ़ी के वायरस

वायरसों के भविष्य के बारे में कुछ भी कह पाना बहुत ही मुश्किल है। लेकिन यह पक्की बात है कि आने वाले समय में इनसे निपट पाना और भी कठिन होगा तथा ये और भी ज्यादा हानिकारक साबित हांेंगे। नई तकनीकियां और सॉफ्टवेयर जो आ रहे हैं उनमें कोई-न-कोई ऐसी खामी रह ही जाती है, जिससे वायरसों का फैलना और आसान हो जाता है। इसलिए वायरसरोधी तकनीकियों पर भी काफी ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए।
कंप्यूटर वायरस शब्द देने वाले व सुरक्षा विशेषज्ञ प्रफेड कोहेन का कहना है कि वायरस की प्रकृति, उसके रूप तो निरंतर विकसित होते जाएंगे। वे कहते हैं यह असंभव सा ही है कि कोई भी वायरस बना लेगा जो दुनिया के हर कंप्यूटर सिस्टम को खराब कर देगा। पर जो बहुत ही जटिल वायरस होंगे, वे लक्ष्य को ज्यादा तरीके से साध सकेंगे और उनका जीवनकाल भी लंबा होगा।

उपहारों वाले वायरस

आपके सिस्टम में कोई वायरस/ट्रोज़न हाॅर्स छ$ वेश में जैसे इलेक्ट्राॅनिक नियंत्रण या ग्रीटिंग कार्ड के रूप में आ सकता है। ई-मेल में हाइपरलिंक पर क्लिक करके, आपको एक ऐसी साइट वेबसाइट पर भेज दिया जाता है। यहां रुज़ कोड आपके सिस्टम को चुपचाप फाइल अपलोड करने का निर्देश देंगे। विशेषज्ञ लाइनक्स आपरेटिंग सिस्टम के लिए वायरस लिखने वालों के बारे में भी पूर्वानुमान लगा चुके हैं और इसे गंभीर चुनौती के रूप में ले रहे हैं।
जब उपयोक्ताओं और कंपनियों को वायरसों से खतरा काफी बढ़ने लगा, तो इसमें सबसे बड़ा खतरा मैलिशियस कोड का ही सामने आया, जो कि साइबर आतंकवाद में प्रयुक्त होता है। रूसी नेता व्लादिमीर झिरिनोव्स्की ने अपने में सार्वजनिक रूप से यह कहा कि हमलावर वायरस/ट्रोजन का उपयोग करके पश्चिम को उसके घुटनों के बल ले आना चाहिए और अब कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज साइबर आतंकवाद ने दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है और यह भी संभव हो सकता है कि बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियार भी कंप्यूटर और इंटरनेट तकनीक पर आधारित हों।

भविष्य की रोकथाम

आप अपनी सुरक्षा कैसे करते हैं? वायरसरोधी सॉफ्टवेयर आपके लिए सबसे बढ़िया तरीका है। वायरसों का पता लगाने के लिए प्रोग्रामर दो तरीके इस्तेमाल करते हैं- एक स्कैनिंग और दूसरा अनुभवों के आधार पर। स्कैनिंग में हस्ताक्षरों को देखा है, जो कोड पंक्ति के रूप में होते हैं और यही कोड पंक्ति वायरस की पहचान करती है। जबकि आसामान्य गतिविधि की जांच के लिए अनुभव आधारित तरीके काम लाए जाते हैं। जैसे कोई एक प्रोग्रामर है जो आपकी विंडोज़ रजिस्ट्री के लिए लिखने की कोशिश करता है। यदि आपका एंटीवायरस सॉफ्टवेयर अपडेट है तो ज्ञान वायरसों को वह पहले ही पता लगा लेगा। ज्यादातर विक्रेता हस्ताक्षरों को हर हफ्रते अपडेट करते रहते हैं। लेकिन नए वायर बहुत ही तेजी से आगे निकल जाते हैं। अभी वायरस का पता लगाने और उसकी जांच करने में विक्रेता को एक से चार घंटे का समय लगता है। लेकिन लवलेटर जैसे वायरस को फैलने में तो कुछ ही सेकेंड लगते हैं।
  1. एंटीवायरस यूटिलिटी प्रयोग करें: एंटीवायरस यानी वायरसरोधी सॉफ्टवेयर सबसे जरूरी होता है और इसे आप अपनी पीसी में इंस्टाॅल कर सकते हैं। सेटअप के दौरान आप अपने विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। आपको पूर्णकालिक आॅटोमेटिक स्कैनिंग लेनी चाहिए, जिससे यूटिलिटी जिप और दूसरी फाइलों के कंटेंटों को जांच सकें। एंटीवायरस सॉफ्टवेयर विक्रेता अपने इन उत्पादों को अपग्रेड भी करते रहते हैं। अधिकतम सुरक्षा के लिए आपको भी अपना एंटीवायरस सॉफ्टवेयर समय-समय पर अपडेट करते रहना चाहिए। कुछ यूटिलिटी ऐसी होती हैं जो सूचनाएं मिलने पर अपने आप ही सॉफ्टवेयर को अपडेट कर सकती हैं।
  2. सॉफ्टवेयर अपडेट करें: आजकल ज्यादातर वायरस इंटरनेट के जरिए ही पहंुचते हैं। इसलिए अपने ई-मेल प्रोग्राम को हमेशा अपडेट रखें। माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक ई-मेल से आने वाले वायरसों से बचाव के लिए तरीके बताता है और माइक्रोसॉफ्ट नियमित रूप से नई सुरक्षा मुहैया कराता रहता है। वेब ब्राउज़र की अनदेखी न करें। जिन लोगों को आप नहीं जानते हैं, उनके अटैचमेंट को न खोलें। ऐसी कोई भी फाइल जो संदिग्ध लगे और जिस पर .vbs एक्सटेंशन हो, उसके बारे में विशेष रूप से चैकस रहे। फिर भी आपको लगता है कि फाइल ठीक है, तो इसे अपने ई-मेल प्रोग्राम के साथ न खोलें। इसे डिस्क पर सेव कर लें और वायरस स्कैनर से इसकी जांच करें।
  3. अपने नेटवर्क की सुरक्षा करें: नेटवर्क की सुरक्षा के लिए आप उन कुछ खास तरह के ई-मेल अटैचमेंटों को प्राप्त न करें, जो सिस्टम के लिए घातक हो सकते हैं। जैसे- .exe या .vbs फाइलें। सभी .doc फाइलों को बंद करके रखने से मैक्रो वायरसों से सुरक्षा में मदद मिल सकती है। लेकिन इससे काम की दक्षता पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। चाहे आप घरेलू पीसी उपयोक्ता हैं या कारपोरेट नेटवर्क, यदि भूल से, असावधानी से वायरस घुस जाता है, तो ऐसे में नियमित रूप से बैकअप जरूरी है।

महत्त्वपूर्ण शब्दावली (Important Terms)


  • Access Code : सूचना और संसाधनों की सुरक्षा के लिए प्रयुक्त विधि जिससे अनाधिकृत (Unauthorised) उपयोगकर्ता को सूचना तक पहुंचने से रोका जाता है।
  • Access Time : मेमोरी से डाटा प्राप्त करने के लिए दिए गए निर्देश तथा वास्तव में डाटा प्राप्त होने के बीच का समय।
  • Accessory : कम्प्यूटर में लगे सहायक संसाधन जिसका प्रयोग प्रोसेसिंग के लिए आवश्यक नहीं, पर सहायक होता है। जैसे- स्कैनर, वेब कैमरा, फ्लॉपी डिस्क ड्राइव आदि।
  • Active Cell : एक्सेल में प्रयुक्त वह खाना या सेल जहां वर्तमान में डाटा लिखा या परिवर्तित किया जा रहा हो।
  • Active Device : वह उपकरण जिसमें विद्युत प्रवाह द्वारा कोई कार्य संपादित किया जा सकता है।
  • Active Window : कम्प्यूटर में उस विण्डों को इंगित करता है जो वर्तमान में प्रयोग में है। अगला आदेश या निर्देश सक्रिय विण्डो पर ही लागू होता है।
  • Accumulator : एक रजिस्टर जो प्रोसेसिंग के दौरान डाटा और परिणामों को भण्डारित करता है।
  • Adapter : दो या अधिक उपकरणों के बीच सामंजस्य के लिए प्रयुक्त युक्ति।
  • Algorithm : किसी कार्य को पूरा करने के लिए कम्प्यूटर को दिये जाने वाले अनुदेशों का क्रम।
  • Analog : लगातार परिवर्तित होने वाली या तरंग रूपीय भौतिक राशि की मात्रा, जैसे- प्रत्यावर्ती विद्युत धारा (AC), विद्युतीय तरंगें आदि।
  • Analog Computer : वह कम्प्यूटर जो ऐसे डाटा का प्रयोग करता है जिसकी मात्रा लगातार परिवर्तित हो रही है।
  • Antivirus : निर्देशों का समूह या प्रयोग जो कम्प्यूटर को द्वेषपूर्ण प्रोग्राम (Virus) में होने वाली क्षति से बचाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • Arithmetic Logic Unit (ALU) : कम्प्यूटर अर्थात् सीपीयू (CPU) का एक भाग जो गणितीय और तार्किक Arithmetic & Logical- स्वहपबंस प्रक्रियाओं को संपन्न करता है।
  • Artificial Intelligence : कम्प्यूटर में मानवीय गुणों के अनुरूप सोचने, तर्क करने, सीखने और याद रखने जैसी क्षमताओं का विकास।
  • ASCII (American Standard Code for Information Interchange) : अक्षरों और संख्याओं को 8 बिट बाइनरी तुल्यांक में पदर्शित करने वाला प्रचलित कोड।
  • Assembly Language : एक कम्प्यूटर भाषा जिसमें अक्षरों और चिन्हों के छोटे-छोटे कोड का प्रयोग किया जाता है। उपयोग से पहले इसे मशीनीय भाषा में बदलना पड़ता है।
  • Audio-Visual : ऐसी सूचना जिसे हम देख और सुन सकते हैं, पर प्रिंट नहीं कर सकते।
  • Auto Cad : रेखाचित्र और ग्राफ को स्वतः तैयार करने वाला सॉफ्टवेयर।
  • Auxilliary Memory : इसे द्वितीयक (Secondary) मेमोरी भी कहते हंै। यह मुख्य या प्राथमिक मेमोरी (Main or Primary) की सहायक तथा बड़ी क्षमता वाली होती है।
  • Backup : प्रोग्राम, डाटा या हाॅर्डवेयर की वैकल्पिक व्यवस्था जिसका प्रयोग मुख्य संसाधन के नष्ट या खराब हो जाने पर किया जाता है। इसके अंतर्गत प्रोग्राम और डाटा की अतिरिक्त कापियाँ बनाई जाती है।
  • Bandwidth : डाटा संचारण में प्रयुक्त आवृत्ति (Frequency) की उच्चतम और निम्नतम सीमा का अंतर। इसे बिट्स प्रति सेकेण्ड से इंगित करते हैं।
  • Bar Code : अल्फान्यूमेरिक डाटा को विभिन्न चैड़ाई की ऊर्ध्वाधर पट्टियों से व्यक्त करना। यह किसी उत्पाद के कूट (Code) के रूप में प्रयोग की जाती है।
  • Binary : एक संख्या पद्वति जिसमें आधार 2 होता है और केवल 0 तथा 1 अंकों का प्रयोग किया जाता है।
  • Biometric Device : व्यक्ति के भौतिक गुणों (पिंफगर प्रिंट, आवाज, हस्तरेखाएं) आदि का प्रयोग कर पहचान स्थापित करने की पद्धति।
  • Bitmap : डाॅट (Pixels) को आॅन और आॅफ (on & off) करने के माध्यम से दिखाया गया रेखाचित्र।
  • Blue tooth : कम आवृत्ति वाली तरंगों का प्रयोग कर मोबाइल के द्वारा कम्प्यूटर को नेटवर्क से जोड़ने की व्यवस्था।
  • Booting : कम्प्यूटर को चालू किये जाने पर द्वितीयक मेमोरी से आपरेटिंग सिस्टम की प्राथमिक मेमोरी में लाया जाना ताकि कम्प्यूटर को प्रयोग के लिए तैयार किया जा सके।
  • Browse : इंटरनेट पर पसंदीदा वेबसाइट को खोजने की प्रक्रिया।
  • Browser : इंटरनेट पर अपनी पसंद की साइट को खोजकर सूचना प्राप्त करने में सहायता करने वाला सॉफ्टवेयर।
  • Bug : कम्प्यूटर प्रोग्राम में आने वाली त्रुटि।
  • Byte : 8 बिटों का समूह जो एक अक्षर को निरूपित करता है।
  • C : एक उच्च स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषा।
  • Chip: सिलिकाॅन की बनी एक पहली युक्ति जिस पर इलेक्ट्राॅनिक सर्किट को बनाया जाता है।
  • CD ROM (Compact Disk- Read Only Memory) : धातु की बनी 12 cm व्यास की भंडारण डिस्क जिस पर एक बार लिखा, पर बार-बार पढ़ा जा सकता है। इसकी क्षमता लगभग 700 मेगाबाइट होती है
  • CD-R (Compact Disk-Recordable) : भंडारण युक्ति जिस पर डाटा को एक बार लिखा परन्तु कई बार पढ़ा। (WORM-Write Once Read Many) जा सकता है।
  • CD ROM Juke BOX (Compact Disk-Read Only Memory Juke Box) : एक भंडारण युक्ति जिसमें अनेक सीडी राॅम डिस्क तथा डिस्क ड्राइव को मिलाकर एक यूनिट का निर्माण किया जाता है। इससे इसकी भंडारण क्षमता अधिक हो जाती है।
  • Central Processing Unit (CPU) : कम्प्यूटर का मुख्य भाग जो कट्रोल यूनिट (CU) अरिथमैटिक लाॅजिक यूनिट (ALU) तथा मेमोरी से मिलकर बना होता है। यह कम्प्यूटर का दिमाग कहलाता है।
  • Character Printer : एक बार में एक कैरेक्टर (अक्षर अंक या चिन्ह) प्रिंट करने वाला प्रिंटर।
  • Control Panel : इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों का वह हिस्सा जहाँ विभिन्न बटन लगे रहते हैं जिनके सहारे उपकरण की दिशा-निर्देश दिया जा सकता है।
  • Control Unit (CU) : सीपीयू का वह भाग जो कम्प्यूटर के कार्यों और उससे लगे उपकरणों पर नियंत्रण रखता है तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करता है।
  • Corel Draw : डेस्कटाॅप पब्लिशिंग (DTP) में प्रयोग किया जाने वाला एक सॉफ्टवेयर जिससे डिजाइन तैयार किये जाते हैं।
  • Cut and Paste : माॅनीटर पर चयनित (Selected) टेक्स्ट या ग्राफिक्स को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर रखना।
  • Cyber Space : कम्प्यूटर के विश्व स्तरीय नेटवर्क का एक प्रचलित नाम।
  • Delete : चयनित किये गये एक या अधिक अक्षर, शब्द, पैराग्राफ या फाइल को डिस्क या मेमोरी से हटाना।
  • Desk Top : कम्प्यूटर स्क्रीन जो कम्प्यूटर के चालू किये जाने के बाद दिखाई देती है।
  • Desk Top Publishing (DTP) : यह कम्प्यूटर का प्रकाशन के क्षेत्र में उपयोग किये जाने के लिए तैयार अप्लिकेशन सॉफ्टवेयर है।
  • Dial up line : टेलीफोन द्वारा नम्बर डायल कर संचार व्यवस्था स्थापित करने की विधि। इसे स्विच्ड लाइन (Switched line) भी कहते हैं।
  • Digital Computer : इलेक्ट्राॅनिक संकेतों पर चलने वाले तथा द्विअधारी अंक पद्धति (Binary number system)का प्रयोग करने वाले कम्प्यूटर।
  • Digital Video/ Versatile Disk (DVD) : यह सूचना भंडारण के लिए प्रयुक्त प्रकाशीय डिस्क है। इसकी भंडारण क्षमता उच्च होती है। इसमें सूचनाओं को लिखने और पढ़ने के लिए लेजर किरणों का प्रयोग किया जाता है।
  • Disk : प्लास्टिक या धातु की बनी गोलाकार,चपटी प्लेट जिस पर चुंबकीय पदार्थ की परत चढ़ी रहती है। इसका प्रयोग डाटा या सूचना के भंडारण में किया जाता है।
  • Disk Operating System (DOS) : कम्प्यूटर को बूट (Boot) करने तथा नियंत्रित करने वाला आपरेटिंग सॉफ्टवेयर।
  • Dots Per Inch (DPI) : प्रति एक इंच में ऊर्ध्वाधर या क्षैतिज रूप में उपस्थित बिंदुओं की संख्या। इसके द्वारा प्रिंट की गुणवत्ता की पहचान की जाती है।
  • Downloading : किसी नेटवर्क में दूरस्थ कम्प्यूटर से स्थानीय कम्प्यूटर पर डाटा या फाइल को लाना।
  • Drag : माउस द्वारा किसी फाइल को क्लिक कर उसे खींचकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना।
  • Drop Down Menu : विण्डोज प्रोग्राम में किसी प्रमुख कार्य से संबंधित उपलब्ध विकल्पों की सूची जो नीचे प्रदर्शित की जाती है।
  • Edit : डाटा की आकृति या स्वरूप में परिवर्तन करना।
  • EEPROM : यह एक भण्डारण चिप है जिसमें उच्च विद्युत विभव द्वारा डाटा को मिटाकर दूसरा डाटा डाला जा सकता है।
  • Electronic Mail : इंटरनेट से जुड़े कम्प्यूटर की सहायता से किसी अन्य इंटरनेट उपयोगकर्ता को संदेश भेजना। प्राप्तकर्ता का उस समय कम्प्यूटर पर उपस्थित होना आवश्यक नहीं है।
  • End User : कम्प्यूटर के प्रयोग से प्राप्त की गई सूचना को किसी अन्य उद्देश्य में प्रयोग करने वाला व्यक्ति।
  • Ethernet : कम्प्यूटर को स्थानीय नेटवर्क (LAN) में जोड़ने के लिए प्रयुक्त तकनीक।
  • Exe file : क्रियान्वित की जा सकने वाली फाइल का एक प्रकार।
  • Expansion Slot : मंदरबोर्ड पर बना स्थान जहां उपकरण लगाकर कम्प्यूटर की क्षमता बढ़ायी जा सकती है।
  • File : सूचनाओं का एक स्थान संग्रहण।
  • Font : एक समान आकृति और आकार में बने कैरेक्टर का संपूर्ण समूह। यह अक्षरों को विभिन्न प्रकार से लिखने की व्यवस्था है।
  • Footer : किसी पेज की सबसे नीचे की पंक्ति में स्वतः लिखा जाने वाला टेक्स्ट।
  • Format : डिस्क के प्रयोग से पूर्व सेक्टर तथा ट्रैक में बांटने की प्रक्रिया।
  • Gigabytes (GB) : मेमोरी की एक इकाई जो 230 बाइट के बराबर है।
  • Hacker : नेटवर्क से जुड़कर अपने स्वार्थों के लिए अन्य कम्प्यूटर का गलत इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति।
  • Hang : कम्प्यूटर द्वारा निर्देशों का पालन न करने की स्थिति।
  • Hard Copy : कम्प्यूटर द्वारा प्रस्तुत स्थायी आउटपुट जिसे कम्प्यूटर के प्रयोग के बिना भी उपयोग किया जा सकता है। जैसे-पेपर पर प्रिंट किया गया आउटफट।
  • Hard Disk : धातु (अल्युमिनियम) का बना कठोर डिस्क, जिस पर चुम्बकीय पदार्थ की परत चढ़ी रहती है। इसका उपयोग डाटा भंडारण में किया जाता है।
  • Hardware : कम्प्यूटर का भौतिक भाग जिसे हम छू कर महसूस कर सकते हैं।
  • Hexadecimal Number System : एक संख्या पद्धति जिसमें कुल 16 मूल संख्याओं का प्रयोग होता है। (0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, A, B, C, D, E तथा F अतः इसका आधार 16 होता है।
  • Home Page : प्रत्येक वेबसाइट का प्रथम पृष्ठ जो उसमें स्थित सूचनाओं की सूची प्रदान करता है।
  • Host : इंटरनेट सेवा या अन्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रयुक्त कम्प्यूटर।
  • Hybrid Computer : डिजिटल व एनालाॅग कम्प्यूटर का मिश्रित रूप।
  • Hyperlink : किसी पेज या दस्तावेज को उसी या किसी अन्य दस्तावेज से जोड़ना।
  • Hyper Text : एक डाक्यूमेंट के किसी शब्द या शब्द समूह को उसी डाक्यूमेंट या किसी अन्य डाक्यूमेंट से लिंक करने की व्यवस्था।
  • Hyper Text Transfer Protocol (HTTP) : विभिन्न कम्प्यूटरों को इंटरनेट पर आपस में जोड़ने के लिए प्रयुक्त नियमों का समूह।
  • IO Port : कम्प्यूटर सिस्टम यूनिट में इनपुट और आउटपुट डिवाइस को लगाने के लिए बना साकेट।
  • Icon : कम्प्यूटर स्क्रीन पर दिखनेवाला चित्र जिसकी सहायता से माउस या किसी अन्य प्वाइंटिंग डिवाइस के सहारे कम्प्यूटर प्रोग्राम को चुना या चालू किया जा सकता है।
  • Inkjet Printer : कागज पर स्याही की छोटी-छोटी बूंदों को जेट द्वारा छिड़क कर प्रिंट करने वाला प्रिंटर।
  • Input : प्रोसेसिंग के लिए डाटा और अनुदेशों को कम्प्यूटर में डालना।
  • Input Device : डाटा और अनुदेशों को कम्प्यूटर में डालने के लिए प्रयुक्त युक्ति।
  • Integrated Services Digital Network (ISDN) : ध्वनि और डाटा स्थानान्तरण के लिए स्थापित डिजिटल टेलीफोन सेवा।
  • Interface : कम्प्यूटर के इनपुट और आउटपुट डिवाइस को सीपीयू या मेमोरी के साथ जोड़ने के लिए प्रयुक्त इलेक्ट्राॅनिक सार्किट।
  • Internal Storage : आंतरिक भंडारण सीपीयू से सीधी जुड़ी हुई मेमोरी।
  • Internet : कम्प्यूटर के नेटवर्कों का नेटवर्क जो दुनिया के विभिन्न कम्प्यूटरों को आपस में जोड़ता है।
  • Internet Service Provider (ISP) : इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली संस्था जिसमें एक या अधिक गेटवे कम्प्यूटर रहता है तथा जो अन्य कप्यूटरों को गेटवे के सहारे इंटरनेट से जुड़ने की सेवा प्रदान करता है।
  • Internet Surfing : इंटरनेट पर उपयोगी सूचनाओं को खोजना।
  • Inter networking : दो या अधिक नेटवर्कों को आपस में जोड़ना।
  • Interpreter : उच्च स्तरीय भाषा को मशीनी भाषा में परिवर्तित करने वाला सॉफ्टवेयर। यह प्रोग्राम को एक-एक लाइन पर परिवर्तित करता है।
  • IP Address (Internet Protocol Address) : इंटरनेट पर किसी वेबासाइट का 32 बिट का अंकीय पता।
  • पाॅप अप (Pop-up): वेब ब्राउजिंग के दौरान स्वयं खुलने वाला विज्ञापन का विण्डो है।
  • Java : एक प्रोग्रामिंग डिवाइस (उपकरण) जिसका प्रयोग मुख्यतः वीडियो गेम, सिमुलेटर, रोबोट आदि में प्वाइंट या सेलेक्ट करने के लिए किया जाता है।
  • JPEG (Joint Photographic Experts Group) : इंटरनेट की ग्राफिकल इमेज (Graphical Images) के लिए इस्तेमाल की जाने वाली काॅम्प्रेशन तकनीक (Compression technQue)
  • Key-Board : एक इनपुट उपकरण जिस पर बने बटनों को दबाकर कम्प्यूटर में डाटा या निर्देश डाले जाते हैं।
  • Laptop : एक छोटा कम्प्यूटर जिसे मोड़कर कहीं भी ले जाया तथा प्रयोग किया जा सकता है। चूँकि इसे गोद (Lap) में रखकर प्रयोग किया जाता है, अतः इसे लैपटाॅप कम्प्यूटर कहते हैं।
  • Laser Printer : लेजर बीम और फोटो विद्युतीय प्रभाव का प्रयोग कर प्रिंट उत्पन्न करने वाला प्रिंटर। यह एक बार में पूरा पेज प्रिंट करता है।
  • Login : कार्य प्रारंभ करने के लिए प्रोग्राम में जाने की प्रक्रिया।
  • Logoff : अपना कार्य समाप्त कर उस प्रोग्राम से बाहर निकलने की प्रक्रिया।
  • Machine Language : एक निम्नस्तरीय भाषा जिसका प्रयोग कम्प्यूटर में सीधे किया जा सकता है। यह प्रत्येक प्रकार के कम्प्यूटर के लिए अलग-अलग होती है।
  • Magnetic Storage : एक भंडारण उपकरण जिसमें चुम्बकीय पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।
  • Main Memory : वह मेमोरी जो सीधे सीपीयू के संपर्क में रहती है।
  • Main Frame Computer : बड़ी मात्रा में डाटा प्रोसेसिंग के लिए प्रयुक्त कम्प्यूटर। इसमें कई उपयोगकर्ता एक साथ कार्य कर सकते हैं।
  • Memory : डाटा व सूचनाओं को संग्रहित करने वाला उपकरण जो आवश्यकता पड़ने पर उसे पुनः प्रकट करता है।
  • Micro Computer : छोटे आकार का स्वतंत्र कप्यूटर जिसमें एक माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग होता है।
  • Microprocessor : एक इंटिग्रेटेड सर्किट चिप जो कम्प्यूटर के मूलभूत कार्यों को संपन्न करती है। इसे सीपीयू (CPU) भी कहते हैं।
  • Modem : यह Modulator- Demodulator का संक्षिप्त रूप है। यह एक इलेक्ट्राॅनिक उपकरण है जो डिजिटल संकेतों को एनालाॅग संकेतों में बदलकर संचार माध्यम पर भेजता है तथा प्राप्त किए गए डिजिटल संकेतों को एनालाॅग संकेतों में बदलता है।
  • Monitor : सॉफ्टकाॅपी प्रदान करने वाला आउटपुट उपकरण। यह कम्प्यूटर में संपन्न होने वाली प्रक्रियाओं को प्रदर्शित भी करता है।
  • Mother Board : कम्प्यूटर सिस्टम का मुख्य पटल जिसमें सभी उपकरण लगाये जाते हैं।
  • Mouse : एक इनपुट उपकरण जिससे प्वाइंट, क्लिक तथा ड्रैग का काम किया जाता है।
  • Multimedia : सूचना प्रदर्शित करने के लिए टेक्स्ट, ग्राफ, एनीमेशन श्रव्य या दृश्य माध्यमों में से दो या अधिक माध्यमों का एक साथ प्रयोग।
  • Multitasking : एक उपयोगकर्ता द्वारा कई कार्यों को एक साथ संपन्न करना।
  • Off line : कम्प्यूटर में प्रयुक्त उपकरण जो सीपीयू से सीधा जुड़ा हुआ नहीं रहता।
  • On line : कम्प्यूटर में प्रयुक्त उपकरण जो सीपीयू से सीधा जुड़ा रहता है तथा सीपीयू का उस पर नियंत्रण रहता है।
  • Optical Mark Reader (OMR) : एक इनपुट उपकरण जो विशेष प्रकार के चिन्होँ/संकेतों को पढ़कर उसे कम्प्यूटर के उपयोग के योग्य बनाता है।
  • Output device : एक उपकरण जो डाटा प्रोसेसिंग के पश्चात उत्पन्न सूचना को प्रदार्शित करता है।
  • Page Setup : प्रिंट करने से पहले डाक्यूमेंट में पेज की स्थिति को निर्धारित करने वाला सॉफ्टवेयर।
  • Password : सुरक्षा की दृष्टि से प्रयुक्त कोड जिसका प्रयोग कर ही कम्प्यूटर का उपयोग किया जा सकता है। पासवर्ड अंकों, अक्षरों तथा चिन्होँ से बना होता है। यह छापे के बड़े और छोटे अक्षरों में पहचान कर सकता है अर्थात यह केस सेंसिटिव (Case Sensitive) होता है।
  • Peripherals : कम्प्यूटर सिस्टम से जुड़े अनेक इनपुट व आउटपुट उपकरण तथा मेमोरी उपकरण जो कम्प्यूटर सिस्टम को चारों तरफ से घेरे रहते हैं।
  • Personal Computer : व्यक्तिगत उपयोग के लिए तैयार एक माइक्रो कम्प्यूटर जिसे विभिन्न कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
  • Piracy : किसी मूल सॉफ्टवेयर की गैर कानूनी तौर पर प्रति बनाना।
  • Printer : एक आउटपुट उपकरण जो कागज पर हार्ड काॅपी प्रस्तुत करता है।
  • Processing : डाटा पर किये जाने वाले कार्य व प्रक्रियाएं जिससे उन्हें सूचना में बदला जा सकें।
  • Procesor : कम्प्यूटर का वह भाग जो कम्प्यूटर की मूलभूत क्रियाओं और अनुदेशों को संपन्न करता है।
  • Program : अनुदेशों का समूह जिन्हें एक क्रम में क्रियान्वित करने पर कम्प्यूटर द्वारा किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति करायी जा सकती है।
  • Programmable Read Only Memjory (PROM) : स्थायी भंडारण की इलेक्ट्राॅनिक युक्ति जिसमें स्थित डाटा को विशेष उपकरणों द्वारा बदला जा सकता है।
  • Programming Language : वह भाषा जो कम्प्यूटर समझ सकता है तथा जिसमें कम्प्यूटर प्रोग्राम तैयार किया जाता है।
  • Public domain Software : इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध सॉफ्टवेयर। इसे शेयर वेयर भी कहते हैं।
  • Random Access Memory (RAM) : मेमोरी का प्रकार जिसमें सूचना पुनः प्राप्त करने मे ंलगा समय सूचना की स्थिति पर निर्भर नहीं करता है।
  • Real Only Memory (ROM) : एक इलेक्ट्राॅनिक मेमोरी उपकरण जिसमें संग्रहित सूचना विद्युत सप्लाई के बिना भी बनी रहती है तथा इसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
  • Reboot : कम्प्यूटर को आॅफ कर पुनः आॅन करने की प्रक्रिया।
  • Router : विभिन्न नेटवर्क को आपस में जोड़ने के लिए प्रयुक्त विधि।
  • Save : कम्प्यूटर में डाटा या सूचनाओं को फाइल में स्टोर करना ताकि उसका भविष्य में प्रयोग किया जा सके।
  • Scanner : एक प्रकार का इनपुट उपकरण जो तस्वीर और रेखाचित्र को डिजिटल चित्र में परिवर्तित करता है।
  • Screen saver : एक चलायमान चित्र जो कम्प्यूटर के एक निश्चित समय तक निष्क्रिय रहने की स्थिति में स्क्रीन पर दिखाई देता है।
  • Scroll : किसी विण्डों में दिखाई देने वाली कम्प्यूटर स्क्रीन से बड़ा डाटा या चित्र को ऊपर-नीचे या दायें- बायें खिसकाने की व्यवस्था।
  • Secondary Memory : एक स्थायी मेमोरी जो सीपीयू से सीधी जुड़ी नहीं रहती तथा कम्प्यूटर बन्द कर देने पर भी डाटा नष्ट नहीं होता।
  • Server Computer : मुख्य कम्प्यूटर जो नेटवर्क से जुड़े अन्य कम्प्यूटरों, साझा संसाधनों तथा सेवाओं पर नियंत्रण रखता है तथा उनकी सेवा उपलब्ध कराता है।
  • Setup : किसी सॉफ्टवेयर को कम्प्यूटर में स्थापित करने की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए तैयार फाइल।
  • Software : कम्प्यूटर प्रोग्रामों का समूह जो कम्प्यूटर के प्रभावी संचालन व उपयोग को सुनिश्चित करता है।
  • Software Package : किसी विशेष कार्य के लिए निर्मित प्रोगामों का समूह जो प्रयोग के लिए एक साथ ही उपलब्ध है।
  • Source Program : मशीनी भाषा से अलग अन्य भाषा में लिखे गए प्रोग्राम।
  • Sector : मेमोरी डिस्क की सबसे छोटी इकाई जिस पर डाटा को लिखा जाता है।
  • Search Engine : वर्ल्ड वाइड वेब पर उपयोगी सूचना वाले वेवासाइट को खोजने के लिए तैयार सॉफ्टवेयर
  • Static Ram : मेमोरी का प्रकार जो डाटा को विद्युत सप्लाई रहने तक ही स्टोर करती है।
  • Sub Script : किसी अंक या अक्षर के बाद उसके नीचे कोई दूसरा अंक या अक्षर छोटे आकार में लिखना।
  • Super Computer : अति उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर जिनमें कई प्रोसेसर समानान्तर क्रम में लगे रहते हैं।
  • Swapping : डाटा व प्रोगाम को डिस्क पर स्टोर करना तथा आवश्यक पढ़ने पर उसे मुख्य मेमोरी में डालना।
  • System Software : प्रोग्रामों का समूह जो कम्प्यूटर सिस्टम के मूलभूत कार्यों को सम्पन्न करने तथा उन्हें कार्य के योग्य बनाए रखने के लिए प्रयुक्त होता है।
  • Touch Screen : प्रयोग में आसान इनपुट उपकरण जिसमें स्क्रीन पर उपलब्ध विकल्पों में से एक का चयन अंगुली द्वारा छूकर किया जाता है।
  • Troubleshooting : सॉफ्टवेयर तथा हार्डवेयर व गलतियों को दूढ़ना तथा उनका निदान खोजना।
  • Undo : विण्डोज सॉफ्टवेयर में पूर्व में दिये गये निर्देशों के प्रभाव को समाप्त करना।
  • Uninterrupted Power Supply (UPS) : कम्प्यूटर को लगातार निर्वाध विद्युत उपलब्ध कराने के लिए प्रयुक्त उपकरण। इसमें बैटरी का प्रयोग किया जाता है।
  • Unix : नेटवर्क उपयोग के लिए तैयार किया गया बहुउपयोगकर्ता, टाइम शेयरिंग आॅपरेटिंग सॉफ्टवेयर।
  • Upload : नेटवर्क में स्थानीय कम्प्यूटर से दूरस्थ कम्प्यूटर को फाइल भेजना।
  • User Friendly : प्रोग्राम या कम्प्यूटर जिसे बिना पूर्व अनुभव के कम जानकार व्यक्ति द्वारा भी आसानी से चलाया जा सकता है।
  • Very Large Scale Intergration (VLSI) : एक चित्र पर 10,000 के करीब इलेक्ट्राॅनिक फर्जों का निर्माण।
  • Video Display Terminal (VDT) : एक कम्प्यूटर टर्मिनल जिसमें इनपुट के लिए की-बोर्ड तथा आउटपुट के लिए माॅनीटर का प्रयोग होता है।
  • Virus : एक छोटा अवैध प्रोग्राम जिसे क्रियान्वित करने पर वह कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तथा सूचना को कुप्रभावित करता है।
  • WAP (Wireless Access Point) : एक युक्ति है जो विभिन्न संचार माध्यमों का जोड़कर एक बेतार नेटवर्क बनाता है।
  • Web Browser : इंटरनेट पर वेबसाइट को खोजने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए प्रयुक्त सॉफ्टवेयर।
  • WiFi : का अर्थ है Wireless Fidelity इसका प्रयोग बेतार तकनीक द्वारा कम्प्यूटर के दो उपकरणों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए किया जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts)


  • डाॅ डगलस (Dr. Douglas Engelbart) ने 1964 में माउस का आविष्कार किया।
  • प्रथम वेब साइट के निर्माण का श्रेय टिम बर्नस ली (Tim Berners Lee) को है। इन्हें World Wide Web का संस्थापक कहा जाता है।
  • बिल गेट्स तथा पाॅल एलेन ने मिलकर 1975 में माइक्रोसॉफ्ट काॅरपोरेशन की स्थापना की।
  • बिल गेट्स की प्रसिद्ध पुस्तक “The Road Ahead” 1995 में लिखी गई। वर्तमान में वे “Bill and Melinda Gates Foundation” द्वारा सामाजिक कार्यों में लगे हैं।
  • भारत के सबीर भाटिया (Sabeer Bhatia) ने फ्री ई-मेल सेवा हाॅटमेल (Hotmail) को जन्म दिया।
  • कैलकुलेटर तथा कम्प्यूटर में अंतर यह है कि कम्प्यूटर को एक साथ कई निर्देश या निर्देशों का समूह दिया जा सकता है तथा यह एक साथ कई कार्य कर सकता है। इसके विपरीत कैलकुलेटर को एक साथ एक ही निर्देश दिया जा सकता है।
  • प्रथम व्यवसायिक इंटीग्रेटेड चिप का निर्माण फेयर चाइल्ड सेमीकण्डक्टर काॅरपोरेशन (Fair Child Semiconductor Corporation) ने 1961 में किया।
  • माॅनीटर का आकार माॅनीटर के विकर्ण (Diagonal) की लम्बाई में मापा जाता है।
  • फ्लॉपी डिस्क का आविष्कार IBM के वैज्ञनिक एलान शुगार्ट (Alan Shugart) ने 1971 में किया।
  • मानव मस्तिष्क और कम्प्यूटर में सबसे बड़ा अंतर यह है कि कम्प्यूटर को स्वयं की सोचने की क्षमता नहीं होती।
  • डिजिटल काम्पैक्ट डिस्क (DCD) का आविष्कार 1965 में जेम्स रसेल ने किया।
  • जीएसएम (GSM-Global System For Mobile Communication) मोबाइल फोन के लिए प्रयुक्त एक लोकप्रिय मानक है।
  • सीडीएमए (CDMA-Code Division Multiple Access) मोबाइल नेटवर्क स्थापित करने की व्यवस्था है।
  • कम्प्यूटर के Standby Mode में माॅनीटर तथा हाॅर्ड डिस्क आॅफ हो जाता है ताकि कम ऊर्जा खपत हो। किसी भी बटन को दबाने या माउस क्लिक करने से कम्प्यूटर Standby Mode से बाहर आ जाता है।
  • आॅप्टिकल माउस (Optical Mouse): में माउस पैड की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि इसमें कोई घूमने वाला भाग नहीं होता

मेमोरी की इकाई – बिट और बाइट (Unit of Memory – Bits and Bytes)

8 लगातार बिटों को एक सीरीज कहा जाता है। इस सीरीज को फ्बाइटय् कहते हैं। बाइट सूचना की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। कम्प्यूटर की सारी क्रियाएँ बाइट में ही मापी जाती हैं।
कम्प्यूटर में स्टोर किया जाने वाला हर बाइट उसके लिए कच्चा माल है, जिसे किसी भी रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। कम्प्यूटर में डाटा के साथ हम दो तरह की क्रियाएं करते हैं- संख्याओं के साथ अंकगणितीय क्रियाएं तथा अक्षरों और चिन्हों के साथ कुछ दूसरी क्रियाएं। किसी बाइट में दोनों तरह के डाटा स्टोर किए जा सकते है। अन्तर सिर्फ उसके उपयोग करने में है। किसी बाइट में संख्या या चिर्,िं से पता चलता है कि आप उसे कैसे इस्तेमाल कर रहे है।
की- बोर्ड के सभी कैरेक्टर, जैसे सभी लेटर्स (अपरकेस और लोवरकेस चिन्हों), नम्बर और सिम्बल, आदि आठ बिटों के अलग-अलग समूहों से बने हैं। बाइट मेमोरी के साइज को मापने की इकाई है। मेमोरी का साइज किलोबाइट (KB), मेगाबाइट (MB), या गीगाबाइट (GB), में भी मापा जाता है।
  • 1 किलोबाइट =1024 बाइट
  • 1 मेगाबाइट=1024 किलोबाइट = (1024 × 1024) बाइट
  • 1 गीगाबाइट= 1024× 1024 किलोबाइट = (1024 × 1024 × 1024) बाइट

बाइनरी संख्याएँ (Binary Numbers)

आप जानते हैं कि दशमलव प्रणाली में कई संख्या लिखते समय दाईं और र्बाइं ओर अंकों का स्थान मान दस गुना होता जाता है जैसे इकाई (1), दहाई (10), सैकड़ा (100), हजार (1000), दस हजार (10000), लाख (100000), दस लाख (1000000) आदि। इसका कारण यह है कि उस संख्या प्रणाली का आधार (10) है, क्योंकि इसमें 10 अंकों (0. 1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8 और 9) द्वारा ही सभी संख्याए.ं लिखी जाती हैं।
परन्तु बाइनरी प्रणाली का आधार 2 है क्योंकि उसमें सभी संख्याए.ं केवल 2 अंकों (0 तथा 1) द्वारा लिखी जाती हैं। इसलिए बाइनरी संख्या लिखते समय बिटों के स्थानीय मान दाईं ओर से र्बाइं ओर दो गुने होते जाते हैं, जैसे 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 128 आदि। यहाँ किसी बाइट की हर बिट का स्थानीय मान (या संख्यात्मक मान) दिया गया है।
ध्यान दीजिए कि बिटों की क्रम संख्याएं दायीं ओर से बायीं ओर डाली गई हैं ओर शुरूआत 0 से की गई है। किसी बिट की क्रम संख्या का उसके मान से सीधा सम्बन्ध है। हर बिट की संख्यात्मक मान 2 पर उसकी क्रम संख्या के घात के बराबर है। उदाहरण के लिए बिट संख्या 3 का मान 23 यानी 8 है। इसी तरह आप दूसरे बिटों के बारे में समझ सकते हैं।
कम्प्यूटरों में सभी संख्याओं को बाइनरी रूप में ही रखा जाता है और इसी रूप में इन पर जोड़ना घटाना आदि अंकगणितीय क्रियाएं की जाती है। इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि किसी भी संख्या को बाइनरी में लिखा जा सकता है।
किसी भी दशमलव संख्या को बाइनरी संख्या में बदला जा सकता है। उसका एक विशेष तरीका है। यहाँ हम केवल पहली 16 दशमलव संख्याओं के बराबर बाइनरी संख्याएं दे रहे हैं
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