Thursday, 7 January 2016

राज्य विधायिका सम्बंधित नोट्स

राज्य विधायिका सम्बंधित नोट्स


राज्य विधायिका
भारतीय संविधान के भाग VI के अनुच्छेद 168 से 212 में राज्य विधायिका के संगठन, गठन, कार्यकाल, अधिकारियों, प्रक्रियाओं, विशेषाधिकारों, शक्तियों इत्यादियों का वर्णन हैं l हालाँकि यह सब संसद के सामान ही है, परन्तु इनमें कुछ अंतर भी है, परन्तु यहाँ हम संगठन और गठन की विषय में चर्चा करेंगे l
राज्य विधायिका के गठन में एक रूपता नहीं है l अधिकतर राज्यों में एक-सदनीय व्यवस्था है l जबकि अन्य में द्विसदनीय व्यवस्था है l वर्तमान समय में केवल 7 राज्यों में की द्विसदनीय व्यवस्था है l

ये राज्य है आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर l तमिलनाडु विधान परिषद अधिनियम, 2010 अभी लागू नहीं हुआ है l 1956 के 7 वें संशोधन अधिनियम में मध्य प्रदेश में विधान परिषद के लिए प्रदान की है। हालांकि, इस आशय की एक अधिसूचना के राष्ट्रपति द्वारा जारी की जाती है l अभी तक इस राष्ट्रपति द्वारा इस आशय की एक अधिसूचना जारी नहीं की गयी है l इसलिए मध्यप्रदेश में अभी तक एक सदनीय विधान सभा है l राजस्थान और असम भी इस आशय का प्रस्ताव किया जा चुका है l
इसका गठन कैसे होता है?

जिन राज्य में द्विसदनीय व्यवस्था है, वहां व्यवस्थापिका राज्यपाल, विधान परिषद और विधान सभा से मिलकर बनती है l
विधान परिषद उच्च-सदन, जबकि विधान सभा निम्न सदन होता है और इससे ही विधान परिषद का निर्माण होता है

दोनों सदनों की संचरना

सदन का गठन
विधान सभा के सदस्यों की संख्या : विधान सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के होते हैं। इसकी सदस्य संख्या न्यूनतम 60 और अधिकतक 500 निर्धारित की गयी है l इसकी न्यूनतम और अधिकतम क्षमता प्रदेश की जनसँख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है l हालांकि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और गोवा में इसके संख्या 30 सदस्य तक निर्धारित की गयी है और मिजोरम और नागालैंड के मामले में इसकी संख्या क्रमश: 40 और 46 निर्धारित की गयी है l मनोनीत सदस्य : राज्यपाल आंग्ल भारतीय सदस्यों को मनोनीत कर सकता है यदि इस समुदाय के सदस्यों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है तो l

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जाति के लोगो की आरक्षण : संविधान में प्रत्येक राज्य जनसँख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति और जन-जाति के लोगो को विधान सभा की सीटों में उपयोक्त आरक्षण उपलब्ध कराया गया है l मूल रूप से ये आरक्षण 10 वर्षों के लिए दिया गया था (यानि 1960 तक) परन्तु इस प्रावधान को प्रत्येक 10 वर्ष बढ़ा दिया जाता है l अब 79 वें संसोधन 2009 ने इसे 2020 तक बड़ा दिया है गया है l

विधान परिषद की संरचना

सदस्य संख्या : विधान सभा के विपरीत विधान सभा के सदस्य को चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है l
परिषद की अधिकतम संख्या 406 पर तय की गई है के सदस्यों की संख्या विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या की एक-तिहाई निर्धारित की गयी है l इसका अर्थ है कि परिषद सदस्यों की संख्या विधा सभा के सदस्यों की संख्या पर निर्भर करती है हालांकि संविधान में अधिकतम और न्यूनतम सीमा तय की है, परिषद के सदस्यों की वास्तिवक संख्या संसद द्वारा निर्धारित की जाती है l

विधान परिषद के कुल सदस्यों की चयन की प्रक्रिया प्रक्रिया :

1. 1/3 सदस्यों का चुनाव स्थानीय निकायों जैसे नगर-निगम और नगर पालिका और जिला बोर्डों इत्यादि के द्वारा किया l

2. 1/12 का चुनाव राज्य में तीन वर्ष से रह रहे स्नातकों के द्वारा किया जाता है l

3. 1/12 का चुनाव राज्य में निवास करने वाले अध्यापकों द्वारा किया जाता है पर माध्यमिक विद्यालय से कम नहीं होना चाहिए l

4. 1/3 का चुनाव विधान सभा के सदस्यों के द्वारा होता है उन लोगो में से किया जाता है जो विधान सभा के सदस्य नहीं होते हैं l

5. शेष सदस्य राज्यपाल के द्वारा शिक्षा, साहित्य, खेल, कला, विज्ञान इत्यादि में ख्याति प्राप्त लोगो में से मनोनीत किये किये जाते हैं l इस प्रकार से कुल सदस्यों में से 5/6 अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते और 1/6 राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते हैं l

सदन का कार्यकाल
लोकसभा की तरह, विधान सभा के एक सतत चैम्बर नहीं है। इसका कार्यकारी इसकी प्रथम बैठक से लेकर 5 वर्ष का होता l 5 वर्ष के बाद यह स्वत: ही भंग मान हो जाती है l हालांकि राज्यपाल कभी भी सदन को भंग करके (यानी 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने से पूर्व ही) नए चुनाव करा सकता है l

परिषद का कार्यकाल
राज्यसभा की तरह, विधान परिषद के एक सतत सदन है, यह एक स्थाई सदन है, यह कभी भंग नहीं होता है l पर इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष बाद रिटायर हो जाते है l इसलिए प्रत्येक सदस्य 6 वर्ष तक सदन का सदस्य रहता है l रिक्त स्थानों को नए चुनावों और राज्यपाल द्वारा मनोनीत किया जाता है, प्रत्येक तीसरे वर्ष के आरंभ में l रिटायर हुए सदस्य द्वारा चुनाव लड़ सकते है और उन्हें पुन्य: मनोनीत किया जा सकता है l

सदन के अध्यक्ष
अध्यक्ष विधानसभा के सदस्यों के बीच से चुने जाते है ।
आमतौर पर, अध्यक्ष विधानसभा के कार्य काल तक अपने पद पर बने रहते हैं l

सदन के उपाध्यक्ष
अध्यक्ष की तरह, उपाध्यक्ष भी विधानसभा के सदस्यों के बीच से ही सदस्य के द्वारा चुने जाते हैं l इसका चुनाव अध्यक्ष के चुनाव के बाद किया जाता है l अध्यक्ष की ही तरह यह भी सदन से कार्यकाल तक अपने पद पर रहता है l अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाने पर यह उसके पद पर आसीन होता है l

परिषद का अध्यक्ष
परिषद के अध्यक्ष का चुनाव, परिषद के सदस्यों के बीच से, सदस्यों द्वारा किया जाता है l

परिषद का उपाध्यक्ष
परिषद के अध्यक्ष की तरह उपाध्यक्ष का का चुनाव, परिषद के सदस्यों के बीच से, सदस्यों द्वारा किया जाता है l

गणपूर्ति (Quorum)
गणपूर्ति कार्रवाही के संचालन के लिए आवश्यक सदस्यों की न्यूनतम संख्या है। यह दस सदस्य या सदस्यों की कुल संख्या का 1/10 होती है (पीठासीन अधिकारी सहित) इनमें से जो भी अधिक होता है l यदि गणपूर्ति नहीं है तो यह अध्यक्ष का कर्तव्य है की सदन की कार्रवाही की गणपूर्ति तक स्थगित करे दे l

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